वेदों में कहा गया है कि जो धारण करने योग्य है, वह धर्म है। इसके साथ ही सेवा-परोपकार में जीवन लगाना, सद्गुणों को आत्मसात करना और भौतिक सुख-सुविधा का मोह न रखना इस जीवन के विभिन्न आयाम हैं, जिसका पालन करना चाहिए। अमेरिका के बुद्धिजीवियों का एक प्रतिनिधिमंडल भारतीय दर्शन तथा सनातन धर्म का अध्ययन करने के लिए भारत आया। प्रतिनिधिमंडल ऋषिकेश पहुंचा। सदस्यों ने गीता भवन पहुंचकर आध्यात्मिक विभूति भाई हनुमानप्रसाद पोद्दार से भेंट की।
रिचर्ड जॉनसन नामक प्रोफेसर ने पूछा, भाई जी, आपकी दृष्टि में धर्म क्या है? भाई जी ने उत्तर दिया, जो कार्य भगवत्प्राप्ति के अनुकूल है, जिसके करने से आत्मा को संतुष्टि मिलती है, वही धर्म है, और जिसे करने से आत्मा कचोटती है, वह अधर्म है।
भाई जी ने उन्हें और विस्तार से समझाते हुए कहा, मानव जीवन बड़े भाग्य से मिलता है। मानव को अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करना चाहिए। माता-पिता तथा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति अपनी कमाई का अंश सेवा और परोपकार में लगाता है, वह एक प्रकार से धर्म का पालन ही करता है। इसलिए धर्मशास्त्रों में दया को, करुणा को धर्म का मूल कहा गया है। सभी अमेरिकी विद्वान भाई जी के मुख से धर्म की अनूठी व्याख्या सुनकर उनके समक्ष नतमस्तक हो उठे।