पिछले दिनों केंद्र सरकार ने बागवानी फसलों के उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान के आंकड़े जारी किए। 2018-19 में बागवानी फसलों का उत्पादन करीब 31.4 करोड़ टन होने का अनुमान है, जिसमें 18.6 करोड़ टन सब्जी उत्पादन की हिस्सेदारी होगी। किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के लक्ष्य में बागवानी फसलों की बड़ी भूमिका है। सब्जियों में मात्रा के लिहाज से आलू सबसे बड़ी फसल है, जिसका इस वर्ष 5.30 करोड़ टन उत्पादन अनुमानित है, जो 2017-18 के मुकाबले 3.4 प्रतिशत अधिक है।
देश में 29 प्रतिशत (करीब 153 लाख टन) आलू उत्पादन के साथ उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर और26 प्रतिशत (करीब 138 लाख टन) उत्पादन के साथ पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। ऐसे ही बिहार 15 प्रतिशत, गुजरात छह प्रतिशत, मध्य प्रदेश छह प्रतिशत और पंजाब पांच प्रतिशत आलू का उत्पादन करते हैं। आलू की खेती पर कई राज्यों के लाखों किसान अपने जीवन यापन के लिए निर्भर हैं।
उत्तर प्रदेश का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र विशेषकर आगरा-अलीगढ़-कानपुर मंडल एक बड़ा आलू उत्पादक क्षेत्र है, जिसमें देश के करीब 20 प्रतिशत आलू का उत्पादन होता है। आलू उत्पादकों की समस्याएं समझने के लिए पिछले तीन साल में मैंने इस क्षेत्र के अनेक दौरे किए। पिछले कुछ सालों में खासकर नोटबंदी के बाद से अपनी फसल की लागत तक न निकाल पाने के कारण आलू उत्पादकों की कमर कुछ ऐसी टूटी है कि इससे जुड़ी पूरी अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुकी है।
आलू उत्पादन में खेत में ही लगभग पांच रुपये प्रति किलोग्राम का खर्चा आता है। तैयार आलू की खुदाई, पैकिंग,परिवहन, शीतगृह भंडारण आदि का खर्च भी करीब पांच रुपये प्रति किलो और जुड़ जाता है। इस तरह किसान के स्तर पर ही कुल खर्च करीब दस रुपये प्रति किलो पड़ता है। इससे नीचे बिकने पर किसान की लागत भी नहीं निकलती। पिछले कुछ साल से किसानों के स्तर पर आलू औसतन पांच-छह रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है।