पिछले सप्ताह गोमाता से जुड़ी दो चीजें हुईं। प्रधानमंत्री ने मथुरा में कहा कि इस देश में कुछ लोग हैं, गाय का नाम सुनते ही जिनके ‘बाल खड़े हो जाते हैं।’ प्रधानमंत्री काफी क्रोधित दिखे, जब उन्होंने यह बात कही, और आगे यह कहा कि ऐसे लोग देश को बर्बाद करने का काम करते हैं। दूसरी खबर यह आई कि ग्यारह लोगों पर से तबरेज अंसारी की हत्या का मुकदमा हटाकर झारखंड की पुलिस अब उन पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलाने वाली है।
एक तरफ प्रधानमंत्री हैं, जो यह मानते हैं कि देश की छवि तब खराब होती है, जब लोग यह कहते हैं कि उनकी सरकार ने गोमाता पर इतना ध्यान आकर्षित किया है कि भारत की छवि एक ऐसे देश की बन रही है, जो आगे बढ़ने के बदले पीछे को जा रहा है। क्या प्रधानमंत्री जानते नहीं कि अगर गायों को लेकर भारत की छवि बिगड़ी है, तो केवल इसलिए कि गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों पर जानलेवा हमले हुए हैं?
एक समय था, जब प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि गोरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा जो लिंचिंग हुई है, वह निंदनीय है। उन्होंने यहां तक कहा था कि इन गोरक्षकों में से कई तो ऐसे हैं, जो रात को हर तरह के अपराध करते हैं और दिन में गोरक्षक का चोला पहन कर अपनी असलियत छिपाते हैं। तो क्या अब उनका मन बदल गया है? क्या वह जानते नहीं कि लिंचिंग की अधिकतर वारदात उन राज्यों में हुई हैं, जहां भाजपा की सरकारें हैं और अक्सर देखा गया है कि सरकारों ने हत्यारों को बचाने का काम किया है।
सोशल मीडिया पर वह वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें तबरेज अंसारी को एक खंभे से बांधकर घंटों मारा गया और उससे ‘जयश्री राम’ कहलवाया गया। पुलिस जब आई, तो हत्यारों को गिरफ्तार करने के बदले वह अंसारी को पकड़ कर ले गई। अस्पताल ले जाने के बदले उसे हिरासत में रखा। दो दिन बाद जब उसकी हालत बिगड़ने लगी, तब उसे अस्पताल लेकर गए, जहां उसकी मौत हो गई। तबरेज के इलाज में अगर विलंब न हुआ होता, तो शायद आज वह जीवित होता।
पिछले पांच वर्षों में ऐसी घटनाओं के कारण भारत की बदनामी हुई है। कुछ विदेशी पत्रकार भारत को लिंचिस्तान कहने लग गए हैं। गाय की सेवा से कोई बदनामी नहीं हुई है। बल्कि गायों की सेवा तो सरकार को और ज्यादा करनी चाहिए, क्योंकि कसाईखानों के पूरी तरह बंद हो जाने से भूखी, लावारिस गायों के झुंड देहातों में किसानों की फसल खाते हुए दिखने लगे हैं। इन लावारिस गायों के लिए अगर बड़े पैमाने पर गोशालाओं का निर्माण होता है, तो इससे देश का नाम ही होगा, बदनामी नहीं।
अपने देश में गोसेवा की परंपरा पुरानी है। यह हमारी सभ्यता का हिस्सा बन चुकी है। लेकिन हमारे यहां गायों का हाल बद से बदतर होता जा रहा है। देहातों और कस्बों में लावारिस गायों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि हर नुक्कड़ पर कमजोर लाचार गाएं कूड़ा और प्लास्टिक खाती हुई दिखती हैं। जिन देशों में गायों की पूजा नहीं होती, वहां ऐसे दृश्य बिल्कुल नहीं दिखते। यह कितने दुख की बात है कि हमारे देश में, जहां गाय की पूजा होती है, वहां उनका इतना बुरा हाल है कि उनको पेट भर चारा देनेवाला भी नहीं है।
लाखों नए गोशालाओं की इस देश में आवश्यकता है। इनका निर्माण होता है, तो देश बिल्कुल भी बदनाम नहीं होगा। लोगों के बाल तभी खड़े होते हैं प्रधानमंत्री जी, जब गोरक्षा के नाम पर इंसानों को मारा जाता है और हत्यारों को सरकारों से शरण मिलती है।