फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉक्यूमेंट्री पर यह प्रतिबंध जरूरी था

Wed, 11 Mar 2015 07:52 PM IST
कुमार प्रशांत
विज्ञापन
विज्ञापन
निर्भया की बर्बर मौत के बाद, मुझे हैरानी है कि हम कितनी बार, कितनी तरह से उसे मारना चाहते हैं? तिहाड़ जेल में बंद बलात्कारी से बीबीसी का इंटरव्यू लेना और फिर कई सारे दूसरे जानकारों से उस पर बात कर, उसे सार्वजनिक प्रसारण के लिए तैयार करना प्रशासन, सरकार और पत्रकारिता को एक साथ कठघरे में खड़ा करता है। लेकिन इससे भी अधिक यह हमें और हमारे समाज को कठघरे में खड़ा करता है; और अफसोस यह है कि यहां हम ही मुद्दई और मुंसिफ, दोनों बन जाते हैं।
विज्ञापन


बलात्कार और बलात्कारी को पहचानने, पकड़ने और सजा देने के सवाल पर हमारी संसद में जो कुछ हुआ और वर्मा कमीशन की रिपोर्ट को जिस तरह आत्माहीन दस्तावेज में बदल दिया गया, उसके बाद यह पूछने की जरूरत ही क्या रह गई कि बलात्कार के बारे में इस राष्ट्र का संकल्प क्या है? साजिश भरी एक गहरी चुप्पी ही हमारा संकल्प है।

हमारा यह घाव बीबीसी के फिल्म-प्रकरण ने एक बार फिर हरा कर दिया। राजनीति अपनी कुंभकर्णी नींद में सो रही थी और बीबीसी की फिल्मकार लेस्ली उडविन तिहाड़ जेल में अधिकारियों से अनुमति लेकर मुकेश का इंटरव्यू रिकॉर्ड कर रही थीं, जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर निर्भया का बलात्कार व हत्या की थी।
विज्ञापन


सवाल इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का नहीं है, सवाल उस मानसिकता को प्रचारित करने में भागीदार बनने का है, जिसका बखान फिल्म में मुकेश और उनके दोनों वकील करते हैं। दोनों वकील वह सब कहते हैं, जो कहने की कुव्वत मुकेश सिंह में नहीं है। वे कहते हैं कि रात में अपने पुरुष-दोस्त के साथ घूमने या उससे शारीरिक संबंध रखने वाली अपनी बेटी को भी वे जला मारेंगे। यह मानसिकता देश में सर्वत्र है, तो क्या करें हम? हथियार डालकर बलात्कारियों में शामिल हो जाएं? या ऐसी मानसिकता के प्रचार का जरिया बनें, ताकि जो घात लगाए बैठा है, उसे अपने करने-सोचने का औचित्य मिल जाए? हमारी आवाज, हमारी कोशिशें और हमारी लड़ाई उन लोगों तक पहुंचती ही नहीं है, जो लड़कियों के बारे में ऐसे अश्लील भाव रखते हैं, उन पर अपनी मालिकी जाहिर करते हैं और हर संभव मौके पर उस पर अमल भी करते हैं। इसलिए बीबीसी को इंटरव्यू की इजाजात नहीं दी जानी चाहिए थी। ऐसी फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध जरूरी था, क्योंकि हम हर जगह इनकी बातों का प्रतिवाद करने के लिए मौजूद नहीं हैं और बगैर प्रतिवाद के जब ऐसी बातें फैलाई जाती हैं, तब दूसरों के लिए प्रोत्साहन का कारण बनती हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी एक दुधारी तलवार है। वह व्यक्ति को स्वतंत्र भी करती है और अपेक्षाकृत कमजोर की आजादी का हरण भी करती है। इसलिए अभिव्यक्ति के अवसर, अभिव्यक्ति के विषय, अभिव्यक्ति के पात्र और अभिव्यक्ति के शिकार सबका सम्यक विश्लेषण करके ही कोई भी समाज इसकी अनुमति देता या नहीं देता है। बीबीसी की फिल्म के बारे में कई लोगों की प्रतिक्रिया थी कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं था कि इसे प्रतिबंधित किया जाए। हम भी यही कहते हैं : इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है कि इसे दिखाया जाए, क्योंकि यह फिल्म बलात्कार के बारे में सोचने पर मजबूर नहीं करती है, बलात्कार का औचित्य प्रसारित करती है। लेस्ली उडविन ऐसा नहीं चाहती होंगी, लेकिन हुआ ऐसा ही है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें