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क्यों जरूरी है सीरिया पर हमला

Tue, 17 Sep 2013 07:42 PM IST
निकोलस क्रिस्टॉफ
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अमूमन कॉलम लिखना एक खेल की तरह हो जाता है, जिसमें हम दूसरों के तर्कों और विचारों से बचते हुए उन पर एकतरफा धावा बोलते हैं। जाहिर है कि सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों को न त्यागने की सूरत में उस पर मिसाइल हमले का समर्थन करके मैंने कई लोगों को नाराज भी किया होगा, पर मैं इस लेख के जरिये ऐसे लोगों की आपत्तियों का जवाब देने की कोशिश कर रहा हूं।
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पहली आपत्ति यह है कि अमेरिका में जब पहले से ही स्कूलों, सड़कों, पुलों इत्यादि बुनियादी संरचनाएं सुधार के इंतजार में हैं, तब सीरिया में अरबों डॉलर खर्च कर देने का क्या औचित्य है? मेरे ख्याल से यह आपत्ति अफगानिस्तान और इराक के मामले में उचित ठहराई जा सकती थी। अफगानिस्तान में एक अकेले सैनिक के इंतजाम में जितना पैसा खर्च होता था, उतने में तो 20 स्कूल खड़े किए जा सकते थे। लेकिन सीरिया की बात अलग है। सीरिया पर मिसाइल हमले में जितना खर्च होगा, वह उस राशि से हर हालत में कम होगा, जो फिलहाल हम सीरिया में गैस हमलों से विस्थापित हुए लोगों की सहायता पर खर्च कर रहे हैं। और अगर कम खर्च में सीरिया में बशर अल असद को कमजोर करके वहां के आम नागरिकों को सुकून दिया जा सके, तो यह घाटे का सौदा तो नहीं।

मेरे इस तर्क के विरोधी कह सकते हैं कि किसी देश पर बम गिराकर वहां के लोगों का भला कैसे मुमकिन है? दरअसल यह समझने वाली बात है कि सीरियाई लोग जानते हैं कि अमेरिकी मिसाइलें पथ से भटक कर अनचाहा नुकसान कर सकती हैं, फिर भी वे शासन के अत्याचारों से बचने के लिए जोखिम उठाने को तैयार हैं। यही वजह है कि सीरियाई सरकार द्वारा देश निकाला झेल रहे नागरिक अमेरिकी मिसाइल हमलों का समर्थन कर रहे हैं।
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सीरियाई मूल की एक अमेरिकी महिला अमल हनानो (छद्म नाम) ने एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर दिए इंटरव्यू में मुझे बताया, ‘लोग चाहते हैं कि सीरिया की वायु सेना को तहस-नहस कर दिया जाए। यहां के हालात इराक से बिल्कुल अलग हैं।’

एक वीडियो में मैने किसी बागी को एक कैदी का हृदय खाते देखा। सीरिया की दिक्कत यह है कि वहां के शासक और विपक्षी दल, दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। कुछ बागी वाकई घिनौने हैं, पर मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि नीचता की हदें पार करने में सरकारी बलों ने भी कोई कसर नहीं रख छोड़ी है।

खाड़ी देशों से मिलने वाले हथियारों और पैसे के दम पर अल कायदा से जुड़े इस्लामी गुट ताकतवर बन बैठे हैं, जबकि हमने अभी तक सीरिया में शांति की चाह रखने वाले बागियों को कोई हथियार मुहैया नहीं कराया है। एक धर्मनिरपेक्ष बागी ने सीरिया डीपली नामक वेबसाइट से कहा, ‘असद के लड़ाकू विमान आए दिन हमें उड़ते दिखते हैं। हम चाहकर भी उन पर हमला नहीं कर पाते, क्योंकि हमारे पास पर्याप्त हथियार ही नहीं हैं। दूसरी ओर इस्लामी गुटों के पास इतने संसाधन हैं, जिनकी बदौलत वे जिसे चाहते हैं, उड़ा देते हैं।’

सवाल यह भी है कि अमेरिका जब भी ऐसे संघर्षों में पड़ा है, उसे बाद में खेद ही जताना पड़ा है, फिर चाहे इराक हो, अफगानिस्तान हो या फिर वियतनाम। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने एक बार कहा था कि उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि वह 1994 में रवांडा में हुए सामूहिक जनसंहार को नहीं रोक पाए। उस दरम्यान पश्चिम की सेना ने फ्रांस के दूतावास को खाली कराते समय एक कुत्ते तक को वहां नहीं रहने दिया था, लेकिन रवांडा के स्टाफ को वहां मरने के लिए छोड़ दिया गया। असंवेदनशीलता की सारी हदें पार करने के ऐसे दृष्टांत कम ही देखने को मिलते हैं।

सीरिया में असद एक लाख लोगों की लाशों पर बैठे मुस्करा रहे हैं और हम हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें? दरअसल जहां तक मुमकिन हो, जनसंहार या सामूहिक हत्याओं की ऐसी जघन्य घटनाओं को रोकने के लिए कोई मापदंड तो होना ही चाहिए। मैं मानता हूं कि सीरिया पर कार्रवाई लोहे के चने चबाने जैसी साबित हो सकती है। इसके नतीजे भी हमें नहीं मालूम। लेकिन अगर सामूहिक जनसंहार जैसे कुकृत्य को रोकने के लिए किए जा रहे अपने निःस्वार्थ मानवतावादी प्रयासों से अगर हम पीछे हटे, तो यह तय है कि इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
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