यूपीए सरकार के घोटालों और मंहगाई से आजिज आ चुकी देश की जनता ने मोदी सरकार को वोट तो दिया था, इन चीजों से छुटकारा पाने के लिए, लेकिन शायद आम आदमी के नसीब में सुख-चैन है ही नहीं। दिलचस्प है कि महंगाई से निजात पाने के लिए केंद्र सरकार हर दिन बैठकें तो कर रही हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
अब चीनी को ही लें। केंद्र सरकार ने चीनी के आयात शुल्क को 15 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी कर दिया, इसका मतलब विदेश से महंगी चीनी आएगी। जब देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक है, तो सरकार ने आयात शुल्क बढ़ाने के बजाय चीनी के आयात पर पूरी तरह से रोक क्यों नहीं लगाई? चीनी के दाम में बढ़ोतरी के दो दिनों के भीतर ही थोक बाजार में इसके दाम 200 रुपये प्रति क्विंटल और फुटकर बाजार में करीब तीन रुपये प्रति किलो से ज्यादा बढ़ गए। उत्तर भारत का किसान इसको उत्तरी राज्यों में चीनी के कम उत्पादन से जोड़कर देखता है।
दरअसल उत्तराखंड में हुई भारी बाढ़ से इन राज्यों में गन्ना उत्पादन प्रभावित हुआ था, जिसका असर चीनी उत्पादन पर पड़ा। मगर दक्षिणी राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु में चीनी उत्पादन में हुई भारी बढ़ोतरी से देश में चीनी का कुल उत्पादन करीब 240 लाख टन से ज्यादा हुआ है, जो देश की सालाना खपत 215-220 लाख टन से कहीं ज्यादा है। अगर इसमें पिछले साल का चीनी का बकाया स्टॉक भी जोड़ दें, तो कुल उपलब्धता 320 लाख टन से ज्यादा की हो जाती है। ऐसे में विदेशों से चीनी के आयात के पीछे मकसद क्या है? क्या यह माना जाए कि केवल चीनी के दाम बढ़ाने के लिए चीनी उद्योग और केंद्र सरकार ने मिलकर एक खेल खेला है, जिससे चीनी महंगी हुई है।
रेलवे के भाड़े में हुई बढ़ोतरी का कारण डीजल महंगा होना बताया जा रहा है। जब सरकार डीजल के दाम की बढ़ोतरी बर्दाशत नहीं कर सकती, तो क्या कभी किसी ने सोचा है कि एक मामूली किसान इस मार को कैसे झेलता है? रेलवे के भाड़े में बढ़ोतरी जरूरी है, तो इसी पैमाने पर क्या सरकार किसानों को विश्वास दिलाएगी कि जब-जब डीजल, खाद आदि के दाम बढ़ेंगे, तब-तब उनकी फसलों के एमएसपी आदि भी उसी आधार पर बढ़ेंगे।
जहां तक प्याज के दाम बढ़ने की बात है, तो यह समझ से परे है, क्योंकि इस साल देश में प्याज की पैदावार पिछले साल के 175 लाख टन से बढ़कर 193 लाख टन हुई है, जबकि देश में प्याज की सालाना खपत लगभग 150 लाख टन है। कहा जा रहा है कि शायद मानसून कमजोर रहेगा, इसलिए दाम बढ़ रहे हैं। मगर प्याज की फसल तो आ चुकी है। आगे मानसून कमजोर भी रहता है, तो प्याज के दाम में बढ़ोतरी उसी समय होनी चाहिए। ऐसे में सरकार अगली फसल के कम उत्पादन का हवाला देकर, बाजार में कमी दिखा रही है, जिसका फायदा थोक विक्रेता और जमाखोर उठा रहे हैं।
देश में आज खाद्यान्न के स्टॉक की कोई कमी नहीं है। केंद्रीय पूल में पहली जून को खाद्यान्न का 622.31 लाख टन का स्टॉक मौजूद है, जबकि तय मानकों के हिसाब से पहली जून को बफर 269 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक होना चाहिए। ऐसे में एग्री जिंसों की कीमतों में आगामी दिनों में भी बढ़ोतरी की आशंका नहीं है, लेकिन अगर सरकार मानसून की कमी का हवाला देकर बाजार में एग्री जिंसों के दाम बढ़वाने में भी कामयाब हो जाती है, तो फिर देश की जनता को मान लेना चाहिए कि वाकई में अच्छे दिन आ गए हैं!
(लेखक राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक हैं)