ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात की शिकायत है कि उनकी सरकार को पिछली सरकारों के मुकाबले 'हनीमून पीरियड' बहुत कम मिला। उन्हें समझना चाहिए कि उनका हनीमून पीरियड इसलिए कम लग रहा है, क्योंकि उन्होंने लोगों से जो बहुप्रचारित वायदे किए हैं, उन सभी को पूरा करने में काफी वक्त लगेगा। दरअसल राजग सरकार कुछ हद तक अपने ही शब्दों में घिर गई है। सत्ता में एक महीने पूरे करने वाली सरकार के सामने कई आर्थिक चुनौतियां हैं, जिनसे आने वाले महीनों में संभवतः उसे जूझना है। रेलवे किराये में तेज वृद्धि करने के बाद फिर उसे वापस लेने से निर्णायक नेता के रूप में मोदी की छवि को नुकसान पहुंचा है। गौरतलब है कि इस समय किराये में आंशिक कटौती का दोष सहयोगी दलों पर नहीं मढ़ा जा सकता, क्योंकि भाजपा के पास पर्याप्त बहुमत है।
तो फिर मोदी ने मुंबई के उपनगरीय ट्रेनों के बढ़े किराये में कटौती क्यों की? यदि यह फैसला महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर किया गया है, तो मोदी सरकार पिछली गठबंधन सरकारों से अलग नहीं है, जिसने विधानसभा चुनावों के कारण लगातार आर्थिक फैसलों को टाला। सच तो यह है कि मोदी ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही ऐसा किया है। उत्तर और पश्चिम भारत में आसानी से जीत हासिल करने के बाद भी सरकार ने ऐसा रक्षात्मक कदम आखिर क्यों उठाया?
इसका जवाब अच्छे दिनों की व्यापक उम्मीद में निहित है, जिसका वायदा मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में किया था। लेकिन मोदी को अच्छी तरह से पता है कि कई आर्थिक समस्याएं सरकार के नियंत्रण से बाहर होती हैं और उनके अच्छे दिन के वायदे को अमल में लाने में समय लगेगा। यहां तक कि बेहतर आर्थिक प्रबंधन के बावजूद विकास दर को छह फीसदी तक पहुंचाने और महंगाई की दर घटाकर पांच फीसदी तक लाने में करीब दो वर्ष लग सकते हैं। हम यकीन नहीं कर सकते कि पिछले चार वर्षों में कुल उपभोक्ता मुद्रास्फीति 50 फीसदी के आसपास पहुंच गई है, जिससे ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में आय घट गई है।
यह सच है कि मोदी सरकार के आने और अपेक्षाकृत स्थिरता की धारणा से शेयर बाजार का सूचकांक 25,000 अंकों के ऊपर चला गया, लेकिन वास्तविक समस्या जमीनी स्तर पर है कि मुद्रास्फीति फिर से बढ़ती दिखाई दे रही है। शेयर बाजार मात्र तीन से चार फीसदी लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जो उसमें निवेश करते हैं। इसलिए मोदी अब लोगों की उम्मीदों को घटाने की कोशिश में लगे हैं, जो उन्होंने चुनाव से पहले जगाई थी। नतीजतन सरकार की ओर से ऐसे अनिश्चयपूर्ण बयान आ रहे हैं कि लोगों को कड़वी गोली निगलनी पड़ेगी। सरकार के आर्थिक प्रबंधकों का स्वर काफी रक्षात्मक होता है, जब वे कहते हैं कि अर्थव्यवस्था को सुधारने में दो वर्ष का समय लगेगा। शायद सरकार का इरादा कुछ समय तक यूपीए पर दोष मढ़ते रहने का है। यह बेहद खराब रणनीति होगी। यहां तक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्हें पूर्वी एशियाई संकट के चलते इससे भी खराब अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, ने भी नहीं कहा था कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उन्हें दो वर्षों का समय चाहिए!
मोदी शासन के पहले महीने में उत्तर और पश्चिम भारत में खराब मानसून की खबरें आईं कि 43 फीसदी कम वर्षा होगी। मोदी अच्छी तरह से जानते हैं कि इन्हीं दोनों क्षेत्रों ने भाजपा को भारी बहुमत दिलाई है। अगर वह युद्ध स्तर पर सूखे से निपटते हुए नहीं दिखे, तो उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण लोगों एवं किसानों का समर्थन खो सकते हैं। मोदी को विशेष रूप से इस बात के लिए चिंतित होना चाहिए कि उत्तर और पश्चिम भारत के इन इलाकों में, जो 50 फीसदी अनाज, दाल और सब्जी का उत्पादन करता है, सूखा पड़ने से खाद्य मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ सकती है। इन सारी समस्याओं से ऊपर इराक के संकट के कारण तेल की कीमती में पिछले कुछ हफ्तों में प्रति बैरल दस डॉलर की वृद्धि हुई है। यह महंगाई को और बढ़ाएगी और रुपये को कमजोर करेगी।
इन सब बाह्य आर्थिक संकटों के बीच मोदी के आर्थिक प्रबंधकों ने कुछ ऐसे खराब फैसले लिए हैं, जो महंगाई बढ़ाने वाले हैं। उदाहरण के लिए, सरकार ने कच्ची चीनी पर आयात शुल्क 15 से बढ़ाकर 40 फीसदी करके चीनी उद्योग को मदद देने के लिए गलत समय चुना है। इससे बाजार में चीनी के दाम उस समय बढ़ गए, जब खराब मानसून और इराक संकट के चलते महंगाई बढ़ रही है।
मोदी ने किसानों से भी अच्छे दिनों का वायदा किया था। उन्होंने कहा था कि वह किसानों को लागत से 50 फीसदी ज्यादा मुनाफा दिलाएंगे। अगर इसे इस समय लागू किया जाए, तो इससे भी महंगाई बढ़ेगी। भाजपा से संबद्ध किसान मजदूर संघ मोदी को िरयायत नहीं देना चाहता और वह किसानों के उत्पाद पर वायदे के अनुसार मुनाफे की मांग कर रही है। भाजपा को उत्तर भारत में बिजली संकट के लिए भी घेरा जा रहा है। ऊर्जा क्षेत्र को व्यावहारिक बनाने के क्रम में बिजली दरों में व्यापक बढ़ोतरी की बात चल रही है, इसका भी खामियाजा आम लोगों को ही उठाना पड़ेगा। पहले ही यूपीए मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए रसोई गैस की कीमतों को दोगुनी करने के फैसले को राजग सरकार ने संभवतः इस डर से टाल दिया है कि इससे लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
धीरे-धीरे बढ़ती यह अनिश्चय की स्थिति मोदी के नेतृत्व में बनी उस सरकार में दिख रही है, जिसे निर्णायक माना जाता है। मोदी की असली चुनौती तब शुरू होगी, जब बजट आएगा। पहले से ही ऐसी भावना है कि मोदी आम आदमी के लिए अच्छे दिन नहीं लाने वाले हैं, जो अभी से ही लोगों को कड़वी गोली निगलने के लिए कह रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में अगर बजट में उद्योगों को ज्यादा राहत दी गई, जिसने इसी उम्मीद में मोदी के चुनाव प्रचार में काफी पैसा खर्च किया, तो भाजपा को लोगों के सामने इसे उचित ठहराने में मुश्किलें पेश आएंगी। चुनाव प्रचार के दौरान बड़े-बड़े वायदे करना अलग बात है और सरकार में रहकर जटिल वास्तविकताओं से निपटते हुए उसे पूरा करना अलग बात।