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शिक्षा: मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में ही क्यों, मध्य प्रदेश को मिसाल बना सकते हैं अन्य राज्य

डॉ. विवेक एस अग्रवाल Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 15 Jul 2025 07:27 AM IST

सार

मध्य प्रदेश में हिंदी भाषा में चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई के साथ ही शुल्क में छूट दी जा रही है, जबकि अन्य राज्य अंग्रेजी के आधिपत्य से मुक्त नहीं हो पा रहे।
 
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डॉक्टर - फोटो : Freepik.com


गौरतलब है कि मेडिकल की पढ़ाई के बाद चिकित्सक का पूरा जीवन मरीजों की देखरेख में बीतता है, जो कि अपना संवाद मूलतः स्थानीय या मातृभाषा में ही करते हैं। अंग्रेजी में तो सीमित बातचीत होती है। लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशक साम्राज्य के दंश अब भी मेडिकल शिक्षा में अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी के विरोध में तो आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन अंग्रेजी के आधिपत्य को कम से कम चिकित्सा शिक्षा से कम करने हेतु कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। यह भी शोध का विषय है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा को अंग्रेजी में देना ही क्यों आवश्यक है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं वर्तमान सरकार की मंशा स्थानीय भाषाओं को प्रोन्नत करने की है। मौजूदा सरकार अंग्रेजी परस्त नहीं है, इसलिए मेडिकल शिक्षा हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषा में प्रदान करने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता।


वैज्ञानिक रूप से भी मातृभाषा में शिक्षा सर्वाधिक प्रभावी होती है। मैंने खुद अपनी चिकित्सा शिक्षा के दौरान महसूस किया की ग्रामीण अंचल से आने वाले और 12वीं तक की शिक्षा हिंदी या स्थानीय भाषा में हासिल करने वाले छात्र यकायक अंग्रेजी आच्छादित वातावरण में खुद को असहज पाते हैं और कई तो भाषा की विवशता के कारण प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। उन में हीन भावना भी पैदा हो जाती है। कई बार तो ऐसे छात्रों को शिक्षक महत्व नहीं देते व उपहास तक उड़ा देते हैं।


एआई के युग में अंग्रेजी में ही चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के पीछे शासन की मजबूरियां समझ से परे हैं। मध्य प्रदेश में शासन की पहल पर लगभग सभी किताबों का हिंदी में अनुवाद कर दिया गया है और हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा हासिल करने पर शुल्क में भी छूट दी जा रही है। शुरुआती वर्ष में ही 30 फीसदी से अधिक छात्रों ने अपनी शिक्षा के लिए हिंदी माध्यम का चुनाव किया। यह इसका द्योतक है कि छात्रों के मानस में अपनी मातृभाषा में पढ़ने की कितनी उत्कंठा है।


एक सरल शुरुआत के रूप में सर्वप्रथम परीक्षा के माध्यम में मातृभाषा का विकल्प प्रदान कर विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सक्षम बनाया जा सकता है। इसके लिए न तो अतिरिक्त अधोसंरचना और न ही उत्तर पुस्तिका जांचने वाले शिक्षकों को अतिरिक्त ज्ञान देने की जरूरत है। यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक, लगभग तीन चौथाई छात्र अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा में प्रदत्त ज्ञान को पूर्णता के साथ नहीं समझ पाते। एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि जब प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तक मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने के विकल्प बहुतायत में उपलब्ध हैं, तो ऐसे में चिकित्सा शिक्षा के लिए अंग्रेजी की बाध्यता कहां तक न्यायोचित है। करीब 12 वर्षों के शिक्षण काल में जिस छात्र ने अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा ग्रहण की हो, उसके लिए यकायक दूसरी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना एक दुष्कर कार्य होता है। बौद्धिक विकास के लिए ठोस आधार मातृभाषा के माध्यम से ही स्थापित हो पाता है, इस बाबत किए गए कई अध्ययन एकमत से शिक्षा को मातृभाषा के माध्यम से प्रदान करने की वकालत करते हैं।


चिकित्सा शिक्षा में तो यह इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि विषय के मूल को स्पष्टता से समझना, प्रचलित एवं विद्यमान बीमारियों के विकल्प में से सही कारण को ढूंढ पाना आवश्यक होता है। यह तब ही संभव हो पाता है, जब  मरीज व चिकित्सक के मध्य संवाद प्रभावी एवं स्पष्ट हो। इसके लिए भी माध्यम मातृभाषा ही होता है। जैसे मरीज चिकित्सक संवाद में बीमारी एवं उसके लक्षण पर चर्चा किताबी ज्ञान के अनुरूप न होकर स्थानीय संदर्भ में ही की जाती है, ताकि मरीज एवं चिकित्सा एक स्तर पर रहकर निदान की सही दिशा में अग्रसर हो सकें। उसके साथ ही दोनों के मध्य भावनात्मक जुड़ाव भी समान भाषा से ही बन पाता है। भाषा के माध्यम से ही सांस्कृतिक समझ गहरी होती है और त्रुटि या भावनात्मक आघात की गुंजाइश भी कम हो जाती है। यह उचित समय है, जब चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा के विकल्प के साथ अंग्रेजी के अनावश्यक बोझ को दूर कर उसके भय के कारण अंतिम छोर पर बैठे युवा को भी चिकित्सक बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

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