उषा की सुनहरी किरणें भारत में सबसे पहले जिन राज्यों को प्रभासित करती हैं, उनमें मणिपुर एक है। मगर त्रासदी गत दिनों यह हुई कि भारतीयों को इस वैष्णव अंचल में प्रवेश के लिए अब अनुमतिपत्र मांगना पड़ेगा। भूमिगत बलवाई संस्था कांग्लेयी यावोल कन्नालुप ने स्वतंत्र मणिपुर राष्ट्र के लिए सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया है। तुर्रा यह है कि इसके सभी सदस्य मेतई वैष्णव हिंदू हैं, जिनके प्रेरणास्रोत सोलहवीं सदी के कृष्णभक्त चैतन्य महाप्रभु हैं। भारतीयों से बेगानगी इतनी बढ़ी कि जनसंघर्ष फैल रहा है। लाचार कांग्रेसी मुख्यमंत्री इकरोम इबोबी सिंह ने विधानसभा में एक विधेयक पेश किया है, जिससे मयांग (बाहरी लोगों) के प्रवेश का नियमन किया जाएगा। पड़ोस के नगालैंड, मिजोरम, अरुणाचल आदि प्रदेशों में इनर लाइन परमिट प्रणाली है। उसे दोबारा मणिपुर में लाने का प्रयास है।
भारतीय स्वतंत्रता के बाद यहां भी गणतंत्र का संविधान लागू किया गया था। उसके अनुच्छेद 19 (1) (डी) के अनुसार, कोई भी भारतीय किसी भी भू-भाग में आ-जा सकता है। यह अब बाधित हो जाएगा। यूं स्थानीय जनता का आरोप है कि नेपाली, बांग्लादेशी, म्यांमार वासी, बिहारी आदि मणिपुर की जनसांख्यिकी बिगाड़ रहे हैं। सीमित संसाधन हैं, जिन्हें हथिया रहे हैं। और यह सब हो रहा है मणिपुरी स्वाधीनता सेनानी और क्रांतिकारी रानी गाइडिल्यू के जन्मशती वर्ष में। तेरह वर्ष की कमसिन आयु में रानी ब्रिटिश जेल में कैद हुई। स्वतंत्रता के बाद ही रिहा हुई। इसी मणिपुर में मोइरंग स्मारक स्तंभ है, जहां 14 अप्रैल 1944 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराया था। मंथन का मुद्दा यह है कि भारत से यह सीमावर्ती भू-भाग आज अलग क्यों होना चाहता है?
भूगोल की स्थिति और इतिहास के मुद्दों को परखें, तो तस्वीर पूरी स्पष्ट हो जाती है। उन्नीसवीं सदी के अंत में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने समूचे पूर्वोत्तर को 1874 से ही अपने उपनिवेश बंगाल प्रांत का बीहड़ पुछल्ला बनाकर सीमांत क्षेत्र घोषित कर दिया था। कुछ आज के पाकिस्तान के कबाइली, तालिबान-ग्रस्त वजीरिस्तान प्रांत की भांति। चाय के बागान, तेल के कुएं और खनिज उत्पाद आदि का दोहन करने के लिए साम्राज्यवादियों ने स्थानीय आदिवासियों को बेगार श्रमिक बनाकर मानव शोषण का नया आयाम रचा था। असम समेत सारा पूर्वोत्तर अंग्रेजों के अधिपत्य में रहा। मगर प्राचीन हिंदू रियासत मणिपुर को कब्जाने के लिए इन विस्तारवादियों को काफी प्रयास करना पड़ा। इतिहास साक्षी है कि कमजोर महाराज और पुराने अजायबघरी अस्त्र लिए उनके सैनिकों को कारतूसवाली बंदूकों से लैस गोरे सिपाहियों ने 1891 में पराजित कर दिया। महाराज वीर टिकेंद्र सिंह, माना जाता है कि जिनका वंश पांडवों से प्रारंभ हुआ था, विदेशियों की दासता में आ गए। एक सोची-समझी साजिश के तहत ब्रिटिश राज ने इन पूर्वोत्तर प्रांतों को क्राउन कालोनी (अंग्रेजी ताज का उपनिवेश) बनाकर भारत तथा चीन के दरम्यान एक मध्यवर्ती अंचल स्थापित करना चाहा था। मगर महात्मा गांधी और उनके शिष्य गोपीनाथ बारडोली ने इस पूरे पूर्वोत्तर (मणिपुर भी) को भारतीय संघ में सम्मिलित कराया।
लेकिन स्वतंत्रता मिलने तथा समाहित होने के बाद भी इस सनातनी और जनजातीय प्रदेश मणिपुर की समस्याएं सुलझी नहीं। भारतीय संघ में 15 अक्टूबर, 1949 में मणिपुरी रजवाड़े के विलय के बाद भी पांच वर्ष लगे, जब जन-प्रतिनिधियों का शासन आया। प्रादेशिक परिषद का निर्वाचन हुआ, लेकिन इसे शीघ्र भंग भी कर दिया गया। कारण सत्तारूढ़ कांग्रेस की राजनीति का अवांछित दबाव था। बस यहीं से सदियों से चले आ रहे निरंकुश राज को पहली गंभीर चुनौती मिली। लोकशाही में प्रतिरोध का यह पहला कदम भी था। समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने अपने पार्टीजनों के साथ राजाज्ञा को नामंजूर कर राजधानी इम्फाल के तिकेन्द्रजीत पार्क में फरवरी 1955 को एक जनसभा आयोजित की। मांग थी कि निर्वाचित परिषद को बहाल किया जाए। उनके साथ रिशांग कीशिंग, लाइसाम अच्छाऊ सिंह, अरिबम तोम्बा सिंह, सुरेन्द्र शर्मा आदि नजरबंद किए गए। मगर लोहिया ने अपनी अभिव्यक्ति की आजादी तथा विरोध जताने के अधिकार के लिए गुवाहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायमूर्ति ब्रज नारायण ने लोहिया और उनके समाजवादी साथियों की कैद को गैरकानूनी करार देकर रिहा कर दिया। लोहिया के सिविल नाफरमानी का एक हिस्सा यह भी था कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को मणिपुर में बिना अनुमतिपत्र के प्रवेश का मूलधिकार हो।
मणिपुर में आज स्थिति यह है कि मूल निवासी 27 लाख हैं, मगर बाहरी लोग सात लाख हो गए हैं। इसका सीधा प्रभाव यहां की अर्थनीति पर पड़ा है। मणिपुर जन अपनी ही कृषिभूमि में श्रमिक बन गए हैं। व्यापार अधिकतर हिंदी-भाषियों के हाथों में है। इसके अंजाम में गरीबी बढ़ी है। शासकीय शोषण ज्यादा हुआ है। असम राइफल्स के सशस्त्र सैनिकों की हरकतें सुर्खियों में रहती हैं। मसलन समाजिक कार्यकर्ता थांगजाम मनोरमा का बलात्कार और हत्या। इस घटना पर मणिपुर महिलाओं ने भारतीय सैनिक मुख्यालय पर विवस्त्र होकर विरोध व्यक्त किया था। सहमी हुई भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायमूर्ति पी. जीवन रेड्डी से जांच कराई। इसमें निरीह नागरिकों की मुठभेड़ में हत्या के मामले भी आए। बहुचर्चित उदाहरण इरोम शर्मीला का है, जो इस सरकारी हिंसा के विरुद्ध वर्षों से उपवास पर हैं।
परमिट प्रणाली की तार्किक परिणति यह होगी कि मणिपुर कुछ भूटान की भांति स्वायत्तता मांगेगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रहे नरेंद्र दामोदरदास मोदी नगालैंड पर ज्यादा अनुकंपा करते हैं, जबकि मणिपुर उनके विचारों और पसंद के नजदीक है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि पूर्वोत्तर की अष्टलक्ष्मी की पहचान को दृढ़ बनाना है। मगर कब?