एक सिपाही ने ऋषि से पूछा, ‘कुछ लुटेरे महल से सामान लूट कर भागे हैं। वे किधर गए हैं?’ परंतु मांडव्य ने मौन व्रत धारण किया था। इसलिए उन्होंने उत्तर नहीं दिया। सिपाहियों ने आश्रम की तलाशी ली, तो उन्हें राजा का धन मिल गया। सिपाहियों ने समझा कि मांडव्य ने ही चोरी की है, इसलिए वे ऋषि को पकड़कर राजा के सामने ले गए। राजा ने मांडव्य को मृत्युदंड दे दिया। राजाज्ञा से मांडव्य को शूली पर चढ़ा दिया गया। मांडव्य, भूखे-प्यासे कई दिन तक शूली पर लटके रहे, किंतु आध्यात्मिक बल के कारण उनकी मृत्यु नहीं हुई। जब कई दिनों के बाद भी मांडव्य के प्राण नहीं निकले, तो अनेक ऋषिगण वहां आए और उन्होंने मांडव्य की स्थिति पर दुख प्रकट करते हुए उनका हाल पूछा। मांडव्य बोले, ‘मैं इसके लिए किसे दोषी मानूं? यह मेरे ही किसी अपराध का फल है।
समझिए कुछ सांस्कृतिक तर्क
मांडव्य ऋषि जिस समय शूली पर चढ़े थे, एक और घटना हुई। उसी समय शीलवती नाम की एक स्त्री रात्रि के अंधकार में अपने पति को लेकर एक वेश्या के घर जा रही थी। उसके पति का पैर मांडव्य को लग गया, जिससे उनकी पीड़ा और बढ़ गई। मांडव्य ने शीलवती के पति को सूर्योदय होते ही मर जाने का शाप दिया। परंतु शीलवती ने अपने पतिव्रत-धर्म के बल से सूर्य को उदय होने से ही रोक दिया। बाद में, देवी अनुसूया के कहने पर मांडव्य ने शाप वापस लिया और शीलवती ने भी सूर्य को उदय होने की अनुमति दे दी।
राजा के पहरेदारों ने देखा कि कई दिन तक शूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी ऋषि की मृत्यु नहीं हुई थी, तो उन्होंने यह बात राजा को बताई। राजा समझ गया कि मांडव्य अवश्य ही कोई सिद्ध तपस्वी हैं और उन्हें शूली पर चढ़ाकर उन्होंने भूल की है। राजा तत्काल मांडव्य के पास गया और उसने उन्हें शूली पर से नीचे उतारा। फिर राजा ने ऋषि से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। मांडव्य ने राजा को क्षमा कर दिया। परंतु एक नई समस्या खड़ी हो गई। ऋषि को शूली से नीचे उतारने के बाद भी शूल की नोंक शरीर से बाहर नहीं निकल पाई और उसे काटना पड़ा। इसके फलस्वरूप, शूल की नोंक ऋषि के शरीर में ही गढ़ी रह गई। शूल को ‘अणि’ भी कहते हैं, इसलिए मांडव्य का एक नाम अणिमांडव्य भी पड़ गया।
बाद में मांडव्य ने धर्मराज से अपने कष्ट का कारण पूछा, तो धर्मराज बोले, ‘आपने बचपन में एक कीट की पूंछ में सींक गड़ा दी थी। आपको उसी अपराध का फल मिला है। जिस तरह थोड़े-से दान का कई गुना फल मिलता है, उसी तरह छोटे-से अधर्म का फल भी कई गुना होकर मिलता है। यह सुनकर मांडव्य ने कहा, ‘आपने मुझे बचपन में किए छोटे-से अपराध का इतना बड़ा दंड दिया है। यह अन्याय है। इसलिए मैं आपको मनुष्य योनि में जन्म लेकर शूद्र होने का शाप देता हूं। बालक के अपराध को अधर्म नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कम आयु में उसे धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता।
मैं आज कर्म-फल की मर्यादा स्थापित करता हूं। चौदह वर्ष की अवस्था तक किए कर्मों का पाप नहीं लगेगा, लेकिन उसके बाद के कर्मों का फल अवश्य मिलेगा।’ मांडव्य द्वारा दिए गए इसी शाप के कारण धर्मराज ने मनुष्य योनि में कुरु वंश में जन्म लिया और दासीपुत्र विदुर कहलाए। परंतु धर्मराज का अवतार होने के कारण विदुर को धर्मशास्त्र का विलक्षण ज्ञान था।