लोकसभा चुनाव की सरगर्मी, लोकलुभावन घोषणाओं और वायदों के बीच आबादी की विकरालता की चर्चा नहीं होती। एक ऐसी समस्या, जो देश के विकास के सारे सोपानों को निगल रही है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, मकान, कानून-व्यवस्था, आवागमन और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं पर भारी पड़ रही हो, वह चुनावी मुद्दा न बने, तो मतदाताओं की समझ और राजनीतिक दलों की नियति पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
वैश्विक होती दुनिया में सभ्य और सुसंस्कृत बनकर अपना स्थान बनाने में हम लगातार विफल होते जाते हैं। हम कहीं भी थूकने, कूड़ा फैलाने, सड़कों पर अराजक व्यवहार करने के लिए जाने जाते हैं। इस तरह हम दुनिया में आने वाली पीढ़ी के हिस्से की हवा, पानी, हरियाली, खेती-बाड़ी की जमीन निगलते जा रहे हैं। इस आपाधापी में जो समर्थ हैं, वे विदेशों में पलायन करने के लिए बेचैन हैं। दूसरी ओर, जो लाचार हैं, वे अराजक, हिंसक और अशिक्षित बन समाज को आतंकित किए हुए हैं। देश की आबादी आज एक अरब 21 करोड़ को पार कर चुकी है। आशंका जताई जा रही है कि जनसंख्या के मामले में वर्ष 2028 तक हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। जनसुविधाओं का सिकुड़ना, अराजकता, उच्छृंखलता और दायित्वहीनता का बढ़ना चिंता का विषय होना चाहिए।
अपने यहां जनसंख्या नियंत्रित करने की योजना 1951 में शुरू की गई थी, जबकि चीन ने 1970 की शुरुआत में इस ओर ध्यान देना शुरू किया। लेकिन चीन ने इसे गंभीरता से लेते हुए जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया। जबकि हमने कुछ ठोस करने की पहल ही नहीं की। 1979 में चीन ने प्रति परिवार एक बच्चा सिद्धांत लागू किया। वर्ष 1984 में भारत की जन्म दर चीन की तुलना में दोगुनी थी।
अशिक्षा और वैज्ञानिक शिक्षा के अभाव में हमारे यहां समाज को उसके विवेक पर छोड़ दिया गया, जो बच्चों को ईश्वर की कृपा मानता है। भीड़तंत्र को हांकने की कला में माहिर राजनीतिक दल खैरात बांटू योजनाओं से वोट की फसल उगाते रहे। देश का बुनियादी विकास उनके एजेंडे में नहीं रहा। विश्व की कुल कृषि जमीन का 2.5 प्रतिशत हिस्सा ही हमारे पास है, पर हम दुनिया की छठी आबादी को पाल रहे हैं। यानी हर वर्ष एक ऑस्ट्रेलिया का बोझ अपने सिर पर लेते हैं।
बढ़ती आबादी कॉरपोरेट व्यापार, बाजार और सफेदपोशों के लिए उर्वरक है। ज्यादा आबादी यानी ज्यादा उपभोक्ता, ज्यादा माल की बिक्री, ज्यादा मुकदमे और ज्यादा मरीज। ये न केवल बाजार को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि गरीबों को और गरीब बनाते जा रहे हैं। हर कोई उचित-अनुचित प्रकार से अपना रास्ता बनाने में लगा है। रेलगाड़ियों में भूसे की तरह सवारियां बैठ रही हैं। सार्वजनिक जगह गंदगी से पट रही हैं। सड़कों का अतिक्रमण आवागमन को रोक रहा है। पर्यावरणीय संरचना लगातार नष्ट हो रही है। बड़ी आबादी को नियंत्रित कर पाने में कानून-व्यवस्था खुद को असमर्थ पा रही है। अनियंत्रित भीड़ को आसानी से हिंसक बनाकर असामाजिक तत्व अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
बढ़ती आबादी के नुकसान ही ज्यादा हैं। उदाहरण के लिए, जमीनों की मांग बढ़ने के कारण खेती योग्य जमीनें कम होती जा रही हैं। सड़कों के फैलाव के लिए जमीनों की जरूरत पड़ रही है। सिकुड़ती खेती अन्न संकट पैदा कर रही है। सिंचाई और पेयजल की मांग के कारण भूजल नीचे खिसकता जा रहा है। विकराल आबादी को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराना तंत्र के लिए मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में अस्वस्थ, अशिक्षित और निठल्ली आबादी दूसरी तमाम समस्याओं को जन्म देती है, जिनमें राष्ट्रप्रेम, दायित्वबोध और संवेदनशीलता का अभाव शामिल है।
ऐसे में, हमें अपने कर्णधारों से यह सवाल करना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता में बढ़ती जनसंख्या का मामला कब शामिल होगा। या वोट बैंक के लिए कल का भविष्य लकवाग्रस्त कर वे समाज को घसीट कर चलने को मजबूर कर देंगे? हमें याद रखना होगा कि अभाव का अपराध और अराजकता से सीधा संबंध है। कल की बेहतरी के लिए आज की आबादी का नियंत्रण जरूरी मुद्दा होना ही चाहिए।