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ट्रंप क्यों चाहते हैं जी-7 में भारत की मौजूदगी

सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 09 Jun 2020 03:42 AM IST
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डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने अप्रत्याशित, अनिश्चित और दबंग होने की काफी प्रतिष्ठा अर्जित की है। उनके दोस्तों और दुश्मनों, दोनों ने समान रूप से कई बार कैमरे के सामने की गई उनकी तीखी टिप्पणियों और ट्वीट का खामियाजा उठाया है। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के साथ गर्मजोशी भरे व्यक्तिगत रिश्ते कायम किए हैं।



लद्दाख और सिक्किम में भारत-चीन सीमा पर चल रहे तनाव पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत का समर्थन करने के साथ ही एक अन्य खबर आई कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को इस वर्ष अमेरिका में होने वाले जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया है।


रूस, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया अन्य नए आमंत्रित देश हैं। अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही क्वाड (क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग) के सदस्य हैं। चीन की चिंताओं और आशंकाओं के मद्देनजर क्वाड के विस्तार की भी चर्चा है।


आमंत्रण को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जी-7 के विस्तार की ट्रंप की पहल को रचनात्मक और दूरदर्शी बताया और कहा कि यह कोविड-19 के बाद की दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर रही है।


प्रतीकात्मक रूप से भारत को अगले जी -7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने का यह निमंत्रण 2005 के असैन्य परमाणु समझौते के बाद अमेरिका द्वारा भारत के प्रति दिखाई गई सबसे बड़ी पहल है। परमाणु समझौते ने जहां भारत के साथ दशकों तक होने वाले परमाणु भेदभाव को खत्म किया था, वहीं जी-7 का यह निमंत्रण अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट संदेश है, विशेष रूप से चीन को कि अमेरिका भारत की वैश्विक और क्षेत्रीय भूमिका को किस तरह से देखता है। भारत को अमेरिका के इस अभूतपूर्व संकेत का लाभ उठाना चाहिए।


हफ्ते भर पहले ट्रंप ने कहा था कि जी-7 का मौजूदा स्वरूप 'पुराना' हो चुका है। उनका स्पष्ट निहितार्थ था कि जी-7 को प्रभावी बनाने के लिए उसमें सुधार जरूरी है। ऐसे विवेकपूर्ण और तर्कसंगत विचार पर भला कौन आपत्ति कर सकता है?


पर अगर दुनिया के आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व उभरते राष्ट्रों को शामिल करके जी-7 को और अधिक प्रासंगिक बनाने का विचार था, तो चीन को इससे कैसे बाहर रखा जा सकता है, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी विदेशी मुद्रा भंडार वाली अर्थव्यवस्था है और सबसे बड़ी व्यापारिक ताकत है? क्या चीन को बाहर रखकर विस्तारित जी-7 कोविड-19 के बाद की दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर सकता है?
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क्या यह प्रयास विश्व को एकजुट करके समन्वित तरीके से साझा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए है या विभिन्न देशों को अमेरिका और चीन के बीच  चयन करने के लिए मजबूर करके दुनिया को बांटना है? इस तरह का विकल्प उनमें से अधिकांश देश नहीं चुनना चाहेंगे। क्या राष्ट्रपति ट्रंप एकता के सूत्रधार या वैश्विक समुदाय के विभाजक के रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?


अब जबकि राष्ट्रपति चुनाव की जंग में मुश्किल से छह महीने ही हैं, व्हाइट हाउस की स्थायी विरासत फिलहाल ट्रंप के दिमाग से दूर है। सौभाग्य से उन्हें चीन के खिलाफ दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है और लोगों का भी व्यापक समर्थन हासिल है, जो पुनर्निर्वाचन के लिए प्रचार में उनकी मदद करेगा।


तो क्या कुछ अनुकूल देशों को शामिल करके जी-7 का विस्तार करने का विचार एक बड़ी रणनीतिक दूरदृष्टि का हिस्सा है? क्या हम एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार लेते देख रहे हैं? या इस वर्ष नवंबर में होने वाले चुनाव में अपने भाग्य को चमकाने के लिए ट्रंप का यह एक अल्पकालिक रणनीतिक कदम है।


अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद अपनी आंखों से भारतीय-अमेरिकियों के बीच हाउडी मोदी कार्यक्रम में हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को देखा है। जाहिर है, जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए मोदी को निमंत्रण न केवल भारत को दुनिया के सबसे धनी और विकसित देशों की श्रेणी में शामिल करता है, बल्कि इससे भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का व्यापक समर्थन भी ट्रंप को मिलेगा! 


हालांकि ट्रंप के असंगत और अपनी बात से पूरी तरह से मुकरने के रिकॉर्ड को देखते हुए भारत के लिए यही बेहतर होगा कि वह अति उत्साह में न आए, बल्कि क्लब जी-7 में अपने प्रवेश के समग्र सकारात्मक प्रभाव के बारे में सावधानीपूर्वक विचार करे।


चुनाव जीतने के बाद फ्लोरिडा में एक धन्यवाद रैली में ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि वह व्हाइट हाउस में भारत के सबसे अच्छे दोस्त होंगे। लेकिन उन्होंने हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल पर मोदी की आयात शुल्क कटौती को खारिज कर दिया।


कुछ महीनों बाद उन्होंने भारत को दुनिया का 'टैरिफ किंग' बताया था। और जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में भारत को आमंत्रित करने के बाद उन्होंने भारत को उन देशों के समूह में शामिल कर दिया है, जिनके खिलाफ अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने धारा 301 के तहत जांच शुरू कर दी है कि वे अनुचित व्यापार प्रथाओं का पालन कर रहे हैं। भारत ने अमेजन, गूगल, फेसबुक और नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियों पर दो फीसदी इक्विलाइजेशन लेवी / डिजिटल सर्विस टैक्स लगाया है, जिससे अमेरिका परेशान हो उठा है।


तथ्य यह है कि दो साल से बातचीत चलने के बावजूद भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर पाए हैं और दोनों देशों ने विश्व व्यापार संगठन में 17 व्यापार विवाद दायर किए हैं, जो रेखांकित करता है कि लेन-देन में माहिर ट्रंप हमेशा सामने वाले से रियायतों की उम्मीद करते हैं। इसके अलावा रूस, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और हिंद-प्रशांत के अंतिम उद्देश्यों पर अमेरिका के साथ हमारे रणनीतिक मतभेद हैं।


हमें जी-7 के साथ जुड़ाव का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि इससे एफडीआई का प्रवाह बढ़ेगा, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण होगा और भारतीय उत्पादों के लिए उन देशों के बाजार तक पहुंच आसान होगी तथा वैश्विक चिंताओं को दूर करने में हम प्रमुख भूमिका निभा सकेंगे। हालांकि चीन के साथ मौजूदा गतिरोध और लंबे सीमा विवाद के बावजूद हमें चीन विरोधी किसी भी धुरी में शामिल नहीं होना चाहिए। यह भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के लिए ठीक नहीं होगा।

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