वर्ष 1959 के प्रतिष्ठित रेडे लेक्चर में सी पी स्नो ने विज्ञान, समाज विज्ञान और मानविकी क्षेत्रों के दिग्गजों के बीच के विशाल फर्क को रेखांकित किया था। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कहा था कि वहां के वैज्ञानिकों द्वारा हासिल की गई ऐतिहासिक उपलब्धियां भी समाज विज्ञान और मानविकी जैसी शाखाओं से विज्ञान की दूरी को पाट नहीं पाईं।
इस संदर्भ में स्नो का गढ़ा हुआ मुहावरा 'दो संस्कृतियां' बिल्कुल मुफीद बैठता है। पिछले छह दशकों के दौरान बेशक यह धारणा कमोबेश बदली है, इसके बावजूद यह फर्क अब भी बरकरार है। टॉमस कन ने अपनी प्रसिद्ध रचना, द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्यूशन्स (1962) में कहा है कि वैज्ञानिक खोज में व्यापक सहमति के आधार पर मॉडल तैयार करने की जरूरत हमेशा ही होती है। बदलाव चूंकि अवश्यंभावी है, लिहाजा संक्रमण काल में हमेशा ही नई चुनौती सामने आती है।
कोविड-19 महामारी के इस दौर में, जब वैक्सीन अभी ढूंढी जानी है, भारत में जन्मे नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक प्रोफेसर वेंकटरमण रामकृष्णन ने वैज्ञानिक बिरादरी को मौजूदा चुनौती से बेहतर ढंग से निपटने के लिए वैज्ञानिक खोज का मजूबत ढांचा तैयार करने के लिए कहा है।
उन्होंने यह भी कहा है कि विज्ञान चूंकि सामूहिक और आपसी सहयोग के आधार पर किया जाने वाला काम है, इसलिए इसमें प्रतियोगिता की भावना से बचा जाना चाहिए। वैज्ञानिक बिरादरी के लिए समाधान ढूंढ पाना कितना कठिन है, इसका पता 1981 के उस दौर में भी चला था, जब सैनफ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क के समलिंगी समुदाय में बड़ी तेजी से एचआईवी फैल गया था। एचआईवी वायरस का टीका अब भी नहीं आया है, यह अलग बात है कि प्रतिरोधात्मक उपायों से इसके आतंक को थोड़ा कम किया गया है। इसलिए अब एड्स का मतलब मौत ही नहीं है।
कोरोना एक नया वायरस है, लेकिन उत्साहित करने वाली बात यह है कि बहुत कम समय में इसके समाधान के लिए बहुत कुछ ढूंढ लिया गया है, जो प्रोफेसर रामकृष्णन के मुताबिक, 'विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव' का परिणाम है।
लेकिन अब भी इसका पता नहीं चल पाया है कि इस वायरस का संक्रमण दूसरे वायरसों की तुलना में आसानी से क्यों होता है, और क्यों कुछ लोग दूसरे लोगों की तुलना में ज्यादा भंगुर हैं। रामकृष्णन इस वायरस का टीका हासिल कर पाने की चुनौती के बारे में तो बताते ही हैं, इस सिलसिले में हमें यह भी याद दिलाते हैं कि चालीस साल बाद भी एड्स की कोई वैक्सीन नहीं है, न ही दूसरी कई संक्रामक बीमारियों का टीका मिल पाया है। ऐसे में, कोरोना वायरस के इलाज के लिए भी संजीदा प्रयासों की जरूरत है।
वह इस बारे में सचेत करते हैं कि 'नए सुबूतों की रोशनी में वैज्ञानिकों में अपनी गलतियां स्वीकारने और उनसे सीखने की प्रवृत्ति' होनी चाहिए। किसी भी वैज्ञानिक खोज से अनिश्चितता जुड़ी हुई है, जबकि गलतियां अवश्यंभावी हैं। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए आंतरिक संवाद और विमर्श बहुत जरूरी है।
वह कहते हैं कि ऐसे में, नीति निर्माताओं को कठिन फैसला करते समय वैज्ञानिकों को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहिए। दरअसल विज्ञान की अनिश्चितता और व्यावहारिक सोच निर्णय प्रक्रिया को जटिल बना देती है। ऐसे में, वैज्ञानिक कई बार गलत फैसले ले लेते हैं, लेकिन इससे उनकी क्षमता और निष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि वैज्ञानिक अध्ययन और निष्कर्ष तो आखिरकार उपलब्ध तथ्यों पर ही आधारित होते हैं।
प्रोफेसर रामकृष्णन याद दिलाते हैं कि कोरोना ने जब शुरू-शुरू में पैर पसारना आरंभ किया था, तब ऐसा माना गया था कि ब्रिटेन इसका मुकाबला करने में सक्षम है। लेकिन बाद की घटनाओं ने इस धारणा को गलत साबित किया।
ऐसे में, भविष्य की किसी और चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहना ज्यादा महत्वपूर्ण है। इससे नीति निर्माताओं और दूसरे लोगों को यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि वैज्ञानिक बिरादरी के लिए कोरोना वायरस या किसी भी महामारी का इलाज ढूंढ पाना कितना कठिन है।