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नजरिया : ट्रंप से सबक क्यों नहीं लेते, क्योंकि टूट गये हैं 'सावधानी से तैयार' किये गये भ्रम

एस प्रसन्नराजन
Updated Thu, 12 Dec 2024 07:36 AM IST

सार

अमेरिकी राजनीति में ट्रंप ने हार को जीत में बदलने का सबसे शानदार उदाहरण प्रस्तुत किया। दूसरी तरफ, भारत में बदली हुई राजनीतिक व्यवस्था में तेजी से अप्रासंगिक हो रहे लोग चुनावी प्रक्रिया में दोष निकालते रहते हैं। लगातार हारों के बावजूद खुद को आत्मविश्वासी दिखाने वाले ट्रंप से सबक क्यों नहीं लेते?
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डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI


अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप ने हार को जीत में बदलने का सबसे शानदार उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे उन्होंने 2020 में नकार दिया था, जब वह राष्ट्रपति जो बाइडन से चुनाव हार गए थे। चुनाव में धांधली का डर अमेरिकी राजनीति में नाराज दक्षिणपंथियों के लिए इतना उत्तेजक बन गया कि वर्ष 2024 में शिकायत की भावना बदला लेने में बदल गई।


पीड़ितों के निर्वाचन क्षेत्र में हारने वाले की शहीद के रूप में छवि सबसे ज्यादा लोकप्रिय बन गई। आखिरकार उन्हें जीत का अपना पल मिल गया। अब देखिए कि भारत में कौन चुनाव में धांधली की शिकायत कर रहा है। इनका ट्रंप से कोई राजनीतिक संबंध नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति-चुनाव के विपरीत, वे भारत की बदली हुई राजनीतिक व्यवस्था में तेजी से अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। वंशवादी संबंधों और पितृसत्ता की व्यवस्था पर बने पुराने गढ़ अब भारत की नई राजनीतिक ऊर्जा और इसकी सांस्कृतिक सामग्री का सामना नहीं कर सकते।


चुनावी धांधली के बारे में शिकायतें एक ऐसे राजनीतिक क्षेत्र में प्रासंगिक बने रहने के कमजोर प्रयास हैं, जो तेजी से अपनी पुरानी पवित्रता को खो रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि राजनीति में हार के प्रबंधन के बारे में कुछ कहा जाना चाहिए और हारने वाला अब भी विजेता के आत्मविश्वास के साथ बात कर रहा है। आइए, चुनाव में धांधली को लेकर दुखी शरद पवार के बजाय हार के दार्शनिक युवराज के बारे में बात करते हैं। हारना और फिर भी विजेता की मुद्रा बनाए रखना राहुल गांधी की खासियत है। अगर आप चुनाव के बाद उनके नाराजगी भरे संरचनात्मक विश्लेषणों को पढ़ें, तो आप बुरी तरह हारने की भारी वास्तविकता को अपनी अंतरात्मा की जीत के सुखद एहसास में बदलने के उनके प्रयास को नहीं भूलेंगे। ऐसा लगता है कि उनके लिए राजनीति अब भी आत्म-साक्षात्कार की एक लंबी यात्रा है।


हर हार में अपनी पहचान साबित करने की इस प्रवृत्ति को और क्या समझा सकता है: एक राजनेता, जो अपने समाजशास्त्र के अनुकूल भारत की तलाश में है, न कि भारत को जीतने की जल्दी में। जब राजनीति एक अस्तित्वगत पहेली होती है, जिसे आप हमेशा सुलझाने की कोशिश करते रहते हैं, तो जीत और हार सापेक्ष होती हैं। जो चीज निरपेक्ष रहती है, वह है अपने अपनाए गए मार्ग के प्रति आपका विश्वास, चाहे वह आपको लगातार विफल ही क्यों न करे।


राहुल गांधी ने एक ऐसा भारत बनाया है, जिसमें पहचान और सामाजिक न्याय की घिसी-पिटी बयानबाजी से कच्चा माल मिलता है, जो उस भारत से बहुत दूर है, जो उन्हें नकारता है। शायद वह भी उस स्थिति से पीड़ित हैं, जो अन्य जगहों पर उदारवादियों को परेशान कर रही है: एक राजनीतिक अभियान, जो अमेरिकी लेखक मार्क लीला के अनुसार मसीहावाद बन गया है। पहचान की राजनीति के मोह में फंसे उदारवादियों को आईना दिखाते हुए उन्होंने लिखा: ‘वे हार रहे हैं, क्योंकि वे उन गुफाओं में चले गए हैं, जो उन्होंने कभी एक बड़े पहाड़ के किनारे खुद के लिए बनाई थीं।’ उनका मसीहावादी मिशन विफल होने के लिए अभिशप्त था, क्योंकि, जैसा कि उन्होंने कहा, ‘मसीहावाद का मतलब सत्ता के सामने सच बोलना है। राजनीति का मतलब है सच्चाई की रक्षा के लिए सत्ता पर काबिज होना।’


राहुल गांधी सत्ता की तलाश नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई के अपने संस्करण का बचाव कर रहे हैं। और चुनावी राजनीति में हार रहे हैं। वह बुरी तरह से हार रहे हैं, क्योंकि वह एक ऐसे भारत के लिए अभियान चला रहे हैं, जिसे उन्होंने अभी तक पूरी तरह से नहीं खोजा है, भले ही उन्होंने सराहनीय ढंग से भारत जोड़ो यात्रा की हो, और वह इसे मोदी के खिलाफ अभियान समझ रहे हैं।
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अगर किसी कारण के दुश्मन की पहचान करना नकारात्मक है, तो हर राजनीतिक अभियान कुछ हद तक नकारात्मक होता है, लेकिन लोकतंत्र के सबसे लोकप्रिय राजनेताओं में से एक पर अपने पूरे राजनीतिक अस्तित्व का निर्माण करना उनकी दुनिया और मोदी को पसंद करने वाले भारत के बीच बढ़ती दूरी को समझने में उनकी विफलता को दर्शाता है। सत्ता उन्हीं लोगों को मिलती है, जो समझते हैं कि यह राजनीति का मूल कारण है। यह ऐसे समय में हमें लोकतंत्र में एक दुर्लभ उपलब्धि की ओर ले जाता है, जब व्यवस्था पर ही तानाशाहों के प्रति सहज आज्ञाकारिता के लिए सवाल उठाए जा रहे हैं।


भारत में, मोदी पर व्यवस्था को झुकाने का आरोप उसी राजनीतिक वर्ग द्वारा लगाया जा रहा है, जिसे इससे नकार दिया गया है। वे एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ तर्क गढ़ने में असमर्थ साबित हुए हैं, जिसने चुनावी जीत को अपनी नैतिक प्रणाली का मूल मंत्र बना लिया है। सत्ता जिनके लिए कोई सफाई या क्षमा याचना नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव के लिए एक स्थायी संघर्ष है, जिसमें वह विश्वास करते हैं।


सत्ता उन लोगों के लिए एक नैतिक स्थिति है, जो लोगों की आकांक्षाओं पर अपनी राजनीति की मीनार गढ़ते हैं। सत्ता के खिलाफ उग्रतापूर्वक दुष्प्रचार करने वालों के पास इसे जीतने के लिए कोई शब्द नहीं बचा है। भारतीय राजनीति में एक ही व्यक्ति है, जो ‘सत्य की रक्षा के लिए सत्ता हथियाता है।’ जीतना उसका लक्ष्य है; और रोना दूसरों का पेशा है।

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