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बांग्लादेश: यूनुस से ज्यादा उम्मीद मत रखिए..मौजूदा स्थिति में हसीना के दौर में हासिल उपलब्धियां उलटने का खतरा

आनंद कुमार, एसोसिएट फेलो एमपी-आईडीएसए Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 11 Dec 2024 06:18 AM IST

सार

शेख हसीना के दौर में भारत व बांग्लादेश के रिश्ते तेजी से मजबूत हुए थे, लेकिन अब वहां अल्पसंख्यकों के साथ जिस तरह की बर्बरता हो रही है, उससे दोनों देशों के बीच रिश्तों में कड़वाहट आई है। ढाका व दिल्ली ऐतिहासिक रूप से बेशक सहयोगी रहे हों, लेकिन फौज का मोहरा बने यूनुस से ज्यादा उम्मीदें लगाना शायद बेमानी होगा।
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बांग्लादेश की घटनाओं के खिलाफ अक्रोशित जनसमूह - फोटो : पीटीआई


बांग्लादेश ने वियना संधि (1961) के उल्लंघन का हवाला देते हुए भारतीय दूत को तलब किया, जो मेजबान देशों को राजनयिक परिसर की सुरक्षा करने के लिए बाध्य करता है। हालांकि भारत ने इस घटना पर खेद जताते हुए सात लोगों को गिरफ्तार किया और लापरवाही के लिए तीन पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया। लेकिन स्थिति तब और बिगड़ गई, जब बांग्लादेश ने अगरतला और कोलकाता से अपने मिशन प्रमुखों को वापस बुला लिया। यह ढाका और नई दिल्ली के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है।


इससे पहले प्रमुख हिंदू धार्मिक नेता और अल्पसंख्यक अधिकारों के मुखर समर्थक चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी से स्थिति और भी खराब हो गई। दास को कथित तौर पर देशद्रोह के आरोप में हिरासत में लिया गया था। आरोप स्पष्ट न होने के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी गई, जिससे पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। खबरें बताती हैं कि शेख हसीना सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ 2,000 से ज्यादा हमले हुए हैं, जिनमें आगजनी, लूटपाट, मंदिरों में तोड़फोड़ और देवताओं का अपमान शामिल है। भारत ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि इन हमलों के अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, बांग्लादेशी अधिकारियों ने शांतिपूर्ण मांग करने वाले एक धार्मिक नेता को निशाना बनाया है।


नई दिल्ली ने दास के खिलाफ आरोपों की आलोचना करते हुए इसे अन्यायपूर्ण बताया और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग की। भारत की चिंताओं को दूर करने के बजाय, ढाका ने इन मुद्दों को ‘आंतरिक मामला’ बताकर खारिज कर दिया। बांग्लादेशी सरकार ने भारत के बयानों को ‘दोनों देशों के बीच मित्रता और समझ की भावना के विपरीत’ बताया। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की है और मौजूदा सरकार से अल्पसंख्यकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए त्वरित कदम उठाने का आग्रह किया। इस कूटनीतिक गतिरोध ने भारत-बांग्लादेश संबंधों के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।


बांग्लादेश की राजनीति शुरू से विभाजित रही है। वहां की मुक्ति-विरोधी ताकतें हमेशा से ही भारत विरोधी रही हैं। सत्ता से शेख हसीना को हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ गई हैं। भारत में रह रहीं हसीना ने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की आलोचना करते हुए उन पर ‘नरसंहार’ में शामिल होने का आरोप भी लगाया है। बदले में यूनुस सरकार ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है, जिसने दरार को और गहरा कर दिया है। ढाका ने नई दिल्ली पर मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया है। यूनुस प्रशासन का दावा है कि हिंदुओं सहित सभी अल्पसंख्यक हसीना के कार्यकाल की तुलना में अंतरिम सरकार में बेहतर ढंग से संरक्षित हैं। बिगड़ते रिश्ते दोनों मुल्कों के मजबूत आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को कमजोर करने का खतरा पैदा करते हैं।


भारत-बांग्लादेश व्यापार 2023-24 में 14 अरब डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन हालिया राजनयिक और धार्मिक तनाव इन उपलब्धियों को बाधित करने वाले हैं। भारतीय दूत प्रणय वर्मा ने हाल ही में बांग्लादेश के कार्यवाहक विदेश सचिव रियाज हमीदुल्लाह से मुलाकात की, जिसमें उन्होंने भारत-बांग्लादेश संबंधों की बहुआयामी प्रकृति और संवाद बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। दोनों पक्षों ने मौजूदा चुनौतियों के बावजूद व्यापार, सुरक्षा और जल-बंटवारे जैसे क्षेत्रों में सहयोग के महत्व को स्वीकार किया। वहीं, भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री नौ दिसंबर को बांग्लादेश दौरे पर पहुंचे और वहां विदेश सचिव व अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से मिलकर हिदुओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर बात की। बांग्लादेश में बढ़ते धार्मिक तनाव पर पश्चिमी नेताओं ने भी चिंता व्यक्त की है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मार्गरेट मैकलियोड ने कहा कि अमेरिका स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है और ढाका में अंतरिम सरकार को अल्पसंख्यक समुदायों में बढ़ती असुरक्षा को दूर करने और मौलिक अधिकारों को बनाए रखने के लिए तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया है।


हालांकि, कई वैश्विक संकटों और राजनीतिक बदलावों के कारण अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों द्वारा महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की संभावना नहीं है। इसके बजाय, उनकी भूमिका बांग्लादेश की लोकतांत्रिक संस्थाओं का समर्थन करने पर केंद्रित हो सकती है, जो परोक्ष रूप से भारत-बांग्लादेश संबंधों को स्थिर कर सकती है। बढ़ते अविश्वास के बावजूद दोनों देशों ने विवादों को सुलझाने की इच्छा का संकेत देते हुए संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। फौज की अंगुलियों पर खेल रहे यूनुस से  ज्यादा उम्मीदें तो वैसे भी नहीं हैं, लेकिन उन्होंने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने के आह्वान की औपचारिकता तो की ही है, उन्होंने दोनों देशों से दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देने का भी आग्रह किया है। भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति बांग्लादेश के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती है।
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दोनों देश 4,000 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं और उनके बीच गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं। जैसा कि यूनुस ने कहा, ‘दोनों देशों के बीच अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और पानी के मुद्दे पर संबंध बहुत करीबी होने चाहिए। हमें उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करना होगा।’ शेख हसीना के कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंध काफी बेहतर हुए, लेकिन मौजूदा स्थिति इन उपलब्धियों को उलटने का खतरा पैदा करती है। दोनों देशों को यह सुनिश्चित करते हुए कि शांति, स्थिरता और विकास की साझा आकांक्षाएं साझेदारी के केंद्र में बनी रहें, रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए निर्णायक रूप से कार्य करना चाहिए। 
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