देश में मानसून के आते ही तेज आंधी से कई स्थानों पर पेड़ उखड़ कर गिर जाते हैं एवं शाखाएं टूट जाती हैं। वैसे आंधी-तूफान से पेड़ों का गिरना कई वर्षों से जारी है, पर पिछले कुछ वर्षों में गिरने वाले पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नगरों एवं महानगरों में मामूली-से आंधी-तूफान से बड़े-बड़े पेड़ धराशायी हो रहे हैं।
दिल्ली जैसे महानगर में तो सड़क किनारे लगे पुराने पेड़ों का गिरना सामान्य घटना है। दिल्ली में 30 मई, 2014 को आये 90 मिनट के आंधी-तूफान से 1,000 पेड़ गिर गए थे। मुंबई महानगरपालिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच मानसून के मौसम में 13,000 पेड़ गिरे, जिससे 120 लोग घायल हुए एवं 18 की मौत हुई।
वर्ष 2017 में भी 10 जून से 21 जुलाई के बीच सड़क किनारे लगे 1,000 पेड़ गिर गए थे। पुणे में अगस्त, 2016 में एक सप्ताह में ही 25 पेड़ धराशायी हो गए थे। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 2014, 2018 एवं 2019 में मानसून के दौरान 200 से ज्यादा पेड़ उखड़ गए थे।
वर्ष 2019 की तीन जुलाई को भी इंदौर शहर में आई आंधी-बारिश से 20 स्थानों पर पेड़ गिरे थे। इंदौर नगर निगम के उद्यान विभाग ने बताया कि 1980 के दशक में सामाजिक वानिकी योजना के तहत लगाए गए ज्यादातर पेड़ कमजोर हो गए थे। इसी जून के शुरू के 12-15 दिनों में भोपाल में पुराने 60 पेड़ धराशायी हो गए।
रिसर्च फांउडेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी ऐंड इकोलाजी संस्था की डॉ. वंदना शिवा ने कुछ साल पहले पेड़ गिरने के तीन प्रमुख कारण बताए थे। पहला है, शहरी वायु-प्रदूषण, जो पेड़ों की वृद्धि एवं विकास पर विपरीत प्रभाव डालकर उन्हें कमजोर करता है, दूसरा, तने के आसपास की धरती को पेवर्स, टाइल्स या सीमेंट कंकरीट से पक्का करना और तीसरा, शहरों के आसपास जंगल घटने से आंधी-तूफान की तीव्रता का बढ़ना। 2014 में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम व उसके आसपास आए हुदहुद तूफान के कारण अलग-अलग लगे पेड़ तो काफी गिर गए थे, पर समूह में घने लगे पेड़ काफी बच गए थे।
मानसून तथा अन्य मौसम में गिरने वाले पेड़ों की बढ़ती संख्या ने नगर नियोजकों, उद्यान विशेषज्ञों, वन अधिकारियों एवं पर्यावरणविदों का ध्यान आकर्षित किया है। इन लोगों ने कई स्थानों पर गिरे पेड़ों का अवलोकन कर इसके जो कारण बताए, वे इस प्रकार हैं-जड़ों एवं शाखाओं की अनियंत्रित कटाई-छंटाई, तने के इर्द-गिर्द सीमेंट-कंकरीट से पक्का चबूतरा बनाना, जहर देकर पेड़ों को सुखाना, विज्ञापन के बोर्ड लगाना, आसपास जल-जमाव की स्थिति एवं रोग-ग्रस्त होना आदि। सड़कों के किनारे ड्रेनेज, पेयजल लाइन डालने या सुधारने के कार्य के दौरान पेड़ों की सड़क की तरफ फैली जड़ें काट दी जाती हैं। इससे पेड़ों का संतुलन बिगड़ जाता है।
पेड़ों की जितनी शाखाएं ऊपर की तरफ चारों ओर फैली रहती हैं, लगभग उसी अनुपात में जड़ें भी भूमि में फैलकर पेड़ का संतुलन बनाए रखती हैं। पेड़ों की छोटी-बड़ी शाखाओं की कटाई-छंटाई भी असंतुलन पैदा करती है। बिजली विभाग लाइन की ओर फैली शाखाओं को मेंटेनेस के नाम पर काट देता है। कई दुकानदार अपनी दुकानों के बोर्ड दिखाने हेतु वहां फैली शाखाएं काट देते हैं।
सोलर-पैनल पर सूर्य का प्रकाश आने के लिए एवं चमगादड़ों के बैठने से परेशानी एवं डर के कारण भी शाखाएं बेतरतीब काट दी जाती है। आजकल सौंदर्यीकरण के नाम पर सड़क किनारे या फुटपाथ पर लगे पेड़ों के तनों के आधार पर पक्का चबूतरा बनाने का चलन है। इससे पानी, प्राणवायु एवं पोषक पदार्थ पेड़ों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाते।
वर्ष 1997 में वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून ने दिल्ली में लगे पेड़ों का अध्ययन कर बताया था कि सीमेंटीकरण से पेड़ कमजोर हो रहे हैं एवं उनकी उम्र भी घट रही है। संभवतः इसी आधार पर जुलाई, 2000 में शहरी विकास मंत्रालय ने नगरीय निकायों को निदेर्शित किया था कि पेड़ों के आसपास पांच-छह फीट क्षेत्र कच्चा रखा जाए। अक्तूबर, 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी एक जनहित याचिका पर फैसले में कहा था कि शहरी विकास मंत्रालय के निर्देशों का पालन किया जाए एवं जहां सीमेंटीकरण हो चुका है, उसे हटाया जाए।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण एनजीटी) ने भी जून, 2013 में इसी प्रकार के निर्देश दिए थे। एनजीटी के इन्हीं निर्देशों को आधार बनाकर इंदौर के राजेंद्र सिंह अजमेरा शहर के 5,000 से ज्यादा पेड़ों के आसपास से सीमेंट-कंकरीट हटवा चुके हैं। उनका यह कार्य अब प्रदेश के अन्य शहरों में भी फैल रहा है। पेड़ काटने का विरोध होने पर या अनुमति न मिलने पर लकड़ी-माफिया चुपचाप पेड़ों की जड़ों में जहर डाल देते हैं। इससे पेड़ कमजोर होकर सूख जाता है। कई बार बड़े-बड़े कीलों से पेड़ों पर विज्ञापन-बोर्ड ठोके जाते हैं, जिसका विपरीत प्रभाव होता है। पेड़ के आसपास लंबे समय तक जल-जमाव एवं किसी रोग का संक्रमण भी कमजोरी पैदा करता है।
वर्षा काल में हजारों संस्थाएं पौधरोपण कार्य करती हैं। उनमें से यदि कुछ संस्थाएं गिरे वृक्षों को प्रत्यारोपित करने का कार्य करें, तो यह भी पर्यावरण हितैषी होगा। जड़ों एवं शाखाओं की नियंत्रित कटाई-छंटाई, तने पर (खांचेदार पत्थर या स्टील से निर्मित) ट्री-ग्रेटिंग लगाना, कीलों से ठोकने के बजाय तार आदि से विज्ञापन-बोर्ड लटकाना, जल-जमाव को रोकना एवं रोगग्रस्त दिखने पर पेड़ पर दवा का छिड़काव आदि कुछ ऐसे प्रयास हैं, जो इस समस्या से थोड़ी राहत दिला सकते हैं। (सप्रेस)