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तफरीह नहीं है गलवां घाटी

विमल मिश्र
Updated Sun, 05 Jul 2020 12:52 PM IST
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लद्दाख की गलवां घाटी - फोटो : Amar Ujala

भारतीय सेना का यह युवा अफसर बारामूला के इंफैंट्री मेस में जिस कमरे में टिका था, उसे हमारे कमरे से अलग करता था लकड़ी का पतला-सा पार्टिशन। हजारों फुट ऊपर हमारे एक जवान का कपाट सीमा पार से आई दुश्मन की एक गोली ने खोल दिया था और सेना के दूसरे जवान घुप्प अंधेरे में हजारों फुट ऊंचे तीखे पहाड़ों से उतार, अपने इस साथी की सांसों की डोर मामूली प्राथमिक उपचारों से किसी तरह थामे रखकर, बर्फबारी से बंद संकरे रास्तों से नीचे ला रहे थे।



बुरी तरह घायल इस जवान की इस यातना यात्रा को लेकर लगातार आती टेलिफोन की घंटियों ने इस अफसर के साथ रात भर हमें भी सोने नहीं दिया। सुबह उठते ही पहली खबर जो सुनी वह थी इस बहादुर सिपाही की मौत से जंग हार जाने की।


नामचीन न्यूज चैनलों पर जब जाने-माने टीवी रिपोर्टर हिमालयी चोटियों की पृष्ठभूमि में इन दिनों जब खून उबाल देने वाली भाषा और आंसू ला देने वाली भाव-भंगिमाओं में चीन के साथ लगी लद्दाख की सीमाओं का हाले-बयान कर रहे हैं, तब  कश्मीर घाटी में बिताई यह कालरात्रि हमें बरबस ही स्मरण हो आई है।


युद्ध आशंकाओं के इस घटाटोप में वायरल होते वे वीडियो शायद आपने भी देखे हों, जो ऐसी रिपोर्टिंग का पोस्टमार्टम करने के साथ वॉर रूम खोले बैठे हमारे टीवी मीडिया पर छाए ‘राष्ट्रवाद’ के खुमार की पोल भी खोलते हैं। देश भर से लेह में इकट्ठा हुआ यह मीडिया पास दिखती पहाड़ियों को चीन सीमा पर हालिया ऐक्शन का केंद्र बनी गलवां घाटी की पहाड़ियां बताकर ‘ग्राउंड जीरो’ से रिपोर्टिंग के लिए खुद की पीठ थपथपा रहा है।


सच्चाई इससे काफी दूर है। कुल मिलाकर करगिल युद्ध के दौरान भी दिखा वही नजारा वापस लौट आया है। दो महीने चले करगिल युद्ध के दौरान सेना ने एक बार भी किसी रिपोर्टर को फॉरवर्ड पोस्ट पर जाने ही नहीं दिया, पर उनमें शायद ही कोई ‘अग्रिम मोर्चे से रिपोर्टिंग’ की शेखियां बघारने से चूका हो।


अगर हम पाकिस्तान या चीन से लगी अपनी सीमाओं को देखें, तो बंकर हों, या तोपें और सैनिक- पहाड़ों की पृष्ठभूमि में सैकड़ों मील आगे-पीछे एक ही जैसा नजारा दिखता है। टीआरपी की होड़ में चैनल भी इसे जाहिर करने की जरूरत नहीं समझते। और दर्शकों को चटखारेदार भाषा और अंदाजे-बयां में भावनाओं के ज्वार में बहा ले जाते हैं।


इस तरह 21 वर्ष पहले जो करगिल में हुआ था, तकरीबन वही इन दिनों गलवां घाटी के मामले में भी हो रहा है, जबकि सचाई यह है कि आज लेह से 40 किलोमीटर आगे जाने की किसी भी पत्रकार को अनुमति ही नहीं। रक्षा संबंधी मुद्दों की रिपोर्टिग दूसरी तरह की रिपोर्टिंग से बिलकुल अलग है।
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इसकी पहली बलि चढ़ती है असली सच की और साथ आपकी अपनी ऑब्जेक्टिविटी की। ऐसा कई बार जरूरी भी लगता है। चूंकि विदेशी मीडिया समूचे घटनाक्रम को अपने चश्मे से देखता है, इसलिए देशी मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। संकट की ऐसी घड़ी में आखिर, देश का हित ही सर्वोच्च होता है।


कोरोना संकट के बीच सीमा पर पैदा तनाव के मद्देनजर मनोबल बढ़ाने के लिए हर कोशिश इस समय जायज है, पर आपको गिनती के ऐसे चैनल मिलेंगे जो यह काम बगैर खबर को सनसनी का पुट दिए करते हैं। सेना क्या केवल युद्ध के उपयोग के लिए है? आप प्राकृतिक आपदाओं में लोगों की प्राणरक्षा, संचार कायम करने, पर्यावरण और वनीकरण के लिए अभियान-जैसे उसके कामों को क्यों भूलते हैं?


दरअसल, भारतीय सेना ही अकेली ऐसी सेना है, जिसका अपना शिक्षा कोर है और जहां मानवाधिकार की कक्षाएं चलती हैं। पर, अपनी सेना की चर्चा आपने अधिकतर सीमा पर तनाव और आतंकवादी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही सुनी होगी। ‘युद्ध बुरी चीज है, पर रोमांटिक और परपीड़क आनंद भी’- यह किसी मनोवैज्ञानिक ने यों ही नहीं कहा है।


डिफेंस रिपोर्टिंग में हमें जो पहली चीज सिखाई गई, वह है जिम्मेदारी। कुछ भी लिखने से पहले उस पब्लिक का सोचिए, जिस पर इसका असर होने वाला है। अपनी ही बिरादरी के उन पत्रकारों का भी ध्यान कर लीजिए, अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना जिनकी जिम्मेदारी ही नहीं, मजबूरी भी है। पर, उनसे भी पहले सोचिए उनकी जो सीमा पर अपनी जान जोखिम में डाले हुए हैं।


उन जवानों की जो दाएं-बाएं सर्र-सर्र करती हैवी मशीनगन से निकलती गोलियों की बरसात, आग बरसाता आसमान, बर्फबारी, कई-कई दिन नहीं थमने वाली बरखा, शून्य से भी 36 डिग्री कम वाली सर्दी, हर तरह का अभाव और पागल कर देने वाले एकांत में, लगातार बीस-बीस घंटे जागकर सीमाओं की रक्षा करते हुए-बगैर किसी प्रतिदान या अपेक्षा के, आत्मनिर्वासित बंदी की तरह चौबीसों घंटे और बरसों-बरस, बगैर आराम की छुट्टी या विराम के जुटे हैं।


ऐसी आपदा के वक्त क्या अपेक्षा है? संभव है, राष्ट्रीय खतरे के इस दौर में आप पूरा सच नहीं दिखा सकें, पर जो सूचना आप दें, वह सच के करीब जरूर हो। वॉर जर्नलिज्म सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर कोई तफरीह नहीं है। यह एडवेंचर नहीं, बहुत खतरे का काम है।


बोस्निया का युद्ध इसकी मिसाल है, जब 20 जुझारू पत्रकारों ने कब्र पर नाम लिखाया, कैमरा लटकाया और चल दिये मोर्चे पर। युद्ध अव्वल तो होगा नहीं, और अगर हुआ, तो सोचिए वार मशीनरी पर पहले से पड़े दबाव के बारे में। इसे और बढ़ाइए मत। खुद के बारे में भी सोचिए कि आप पर हमला हुआ तो कौन अस्पताल ले जाएगा?

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