विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार की तरफ से विशेष अनुदान देने की बात विचारणीय लग सकती है, मगर इसमें तीन प्रश्न तत्काल उभरते हैं। पहला मसला यह है कि चुनिंदा स्कूलों को चिन्हित करके और बाकी स्कूलों को एक तरह से अपने हाल पर छोड़ देने की यह नीति क्या इस हकीकत का परोक्ष रूप से स्वीकार नहीं है कि समावेशी विकास के बारे में बातें जितनी भी हों, सरकार इस मामले में पूरी तरह असफल हो चुकी है और इसीलिए चुनिंदा स्कूलों को चिन्हित करके वह कम से कम ‘प्रस्तुत’ करने लायक कुछ करना चाह रही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर फीस के तौर पर हर माह हजारों रुपये लेने वाले और इसके अलावा डेवलपमेंट फंड के तौर पर सालाना हजारों रुपये अभिभावकों से वसूलने वाले निजी स्कूलों को, जहां दाखिला पाने के लिए भी परोक्ष/अपरोक्ष रूप से 'डोनेशन' के नाम पर धन वसूला जाता है- इस सूची में क्यों शामिल किया गया है।
मिसाल के तौर पर सरकार की तरफ से सस्ती दर पर जमीन तथा अन्य सुविधाएं मिलने के चलते ऐसे स्कूलों के लिए यह अनिवार्य है कि वह शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एक निश्चित मात्रा में वंचित तबकों से आने वाले बच्चों को अपने यहां न केवल दाखिला दें, बल्कि बराबरी से पढ़ाएं, मगर अधिकतर स्कूल इसका उल्लंघन करते दिखते हैं। इसका एक तरीका होता है अभिभावकों के आय प्रमाणपत्रों को फर्जी बना कर इस कोटे के तहत प्रवेश दिलाना। याद रहे महज दो साल पहले जब दिल्ली सरकार ने सख्ती की थी, तो महज एक निजी स्कूल में ऐसे साठ मामले मिले थे, जिनमें से एक ‘गरीब’ छात्र महंगी कार से स्कूल पहुंचता था, तो कई अन्य बच्चों के मां-बाप फैक्टरियों के मालिक, अंतरराष्ट्रीय व्यापारी और उद्यमी थे। तीसरे यह सरकारी स्कूलों की वास्तविकता से रूबरू होने के बजाय कुछ दिखावटी करने जैसा है।
जैसे, वही माध्यमिक स्कूल इसके लिए पात्र समझे गए हैं, जिनके पास प्रयोगशाला के लिए 1,500 वर्ग फीट का बिल्ट अप एरिया है। अगर सर्वेक्षण करें, तो कितने सरकारी माध्यमिक स्कूलों के पास इतना क्षेत्र उपलब्ध है, और अगर प्रयोगशाला के लिए जगह है, तो कितने उपकरण मौजूद हैं।
स्कूलों में विज्ञान शिक्षा की गुणवत्ता को कथित तौर पर सुधारने के नाम पर उठाए जा रहे यह कदम एक तरह से आम तौर पर शिक्षा के प्रति और खास तौर पर विज्ञान शिक्षा के प्रति सरकार के बेहद बेरुखी भरे रुख को दर्शाता है।