लोकसभा चुनावों से ठीक एक वर्ष पूर्व आने वाला बजट सरकार पर काफी दबाव बना सकता है, जिसे अमूमन मतदाताओं के हर तबके को खुश करने की कवायद करनी पड़ सकती है। कॉरपोरेट जहां जीएसटी के लागू होने के बाद, जिसका उन पर मिला-जुला प्रभाव पड़ा है, कुछ रियायत की उम्मीद कर रहे हैं, तो आम करदाता इस उम्मीद में हैं कि उनके निरंतर बढ़ते कुल कर बोझ को कम करने के लिए सरकार कुछ कदम उठा सकती है। हर बीतते साल के साथ वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले कर का दायरा बढ़ता जा रहा है। बहुत संकीर्ण तरीके से भी अनुमान लगाएं, और यदि अप्रत्यक्ष करों को भी जोड़कर देखें, तो अधिकांश करदाताओं की पचास फीसदी आय करों के भुगतान में चली जाती है।
चूंकि बचत पर ब्याज दर कम करने का सीधा असर करदाताओं की बचत पर पड़ा है, लिहाजा वह उत्सुक होंगे कि क्या उन्हें किसी तरह की रियायत मिलने जा रही है। पिछले वर्ष न्यूनतम आयकर की दर दस फीसदी से घटाकर पांच फीसदी कर दी गई थी, जिससे उनकी अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक है। कुछ लोग यह महसूस करते हैं कि जीएसटी के लागू होने के बाद आयकर से छुटकारा पाने का यही सही समय है, उनका यह भी तर्क है कि सरकार ने पिछले वर्षों में जिस तरह के साहसिक कदम उठाए हैं, उसमें यह असंभव नहीं है।
आने वाला बजट, सरकार के लिए सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को एक धक्का देने का अवसर है, ताकि और रोजगारों का सृजन हो, बजटीय आवंटन में संतुलन हो और आधारभूत ढांचे में होने वाले खर्चों में बढ़ोतरी हो। इस बात की पूरी संभावना है कि जिनकी आय अधिक है, उन पर कर बढ़ सकता है; नोटबंदी के बाद और अधिक लोगों को आयकर के दायरे में लाया गया है। निचले क्रम के करदाताओं को कर में छूट की न्यूनतम संभावना है, उन्हें उम्मीद है कि मानक कटौती लाई जा सकती है।
मानक कटौती को फिर से लाए जाने की मांग बढ़ रही है, जोकि 2004-05 के वित्तीय वर्ष तक लागू थी। वित्त मंत्री वेतनभोगी करदाताओं का बोझ कम करने के लिए वेतन से होने वाली आय पर पुरानी पड़ चुकी विविध तरह की कटौती को हटाकर मानक कटौती ला सकते हैं। उदाहरण के लिए बुनियादी छूट की सीमा वर्तमान के ढाई लाख रुपये से बढ़ाकर तीन लाख रुपये की जा सकती है।
इसी तरह से उच्चतम सीमांत कर दरें, हांगकांग और सिंगापुर जैसे देशों में 13 से 22 फीसदी हैं, उच्चतम कर दायरे में आने वाले यह तर्क दे सकते हैं कि भारत में भी ऐसी दरें लागू होनी चाहिए। आयकर श्रेणियों में किसी भी तरह का बदलाव बहुत बड़ी चुनौती साबित हो सकता है, लेकिन हाल के वर्षों में आयकर दाताओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी के कारण आयकर की दरें घटाई जा सकती हैं, खासकर ऐसा करना इसलिए भी जरूरी दिखता है, क्योंकि नागरिकों पर अप्रत्यक्ष कर का बोझ बढ़ता जा रहा है।
यदि बजट में ऐसे लोकप्रिय कदम होंगे, तो इससे अर्थव्यवस्था को भी गति मिल सकती है, क्योंकि लोगों के पास खर्च करने के लिए धन अधिक होगा, जैसा कि सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद देखा गया था कि किस तरह करदाताओं का खर्च बढ़ गया। इस बात की संभावना है कि वित्त मंत्री अतिरिक्त कर संग्रह के लिए अपेक्षाकृत अधिक आय वालों पर कर बढ़ा सकते हैं, या फिर पचास लाख रुपये से अधिक आय वालों पर सरचार्ज लगा सकते हैं या फिर राष्ट्र निर्माण के नाम पर कोई नया सरचार्ज ला सकते हैं।
शेयर सूचकांक की छलांग, निवेशकों का बढ़ता दायरा और कम नियत रिटर्न, ये सब निवेशकों को शेयरों को परखने का अवसर दे रहे हैं। शेयर और कर्ज में होने वाले निवेशों पर लगने वाले करों की विसंगति पर बहस का मुद्दा है। ऋण निवेश के लिए तीन साल के लॉक-इन की तुलना में सरकार एक वर्ष से अधिक समय के लिए सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों की बिक्री से उत्पन्न होने वाली आय के गैर-कर-निर्धारण पर राजस्व का त्याग करती है। इससे ऋण और इक्विटी निवेशकों के बीच असमानता उत्पन्न होती है।
हालांकि इसका एक प्रतिगामी तर्क यह है कि क्या बाजार की भावना को छेड़ना सही होगा और फिर खरीद या बिक्री से संबंधित हर लेनदेन पर सिक्युरिटीज ट्रांजेक्शंस टैक्स (एसआईटी) तो वसूला ही जा रहा है। दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) के बाद तो एसआईटी का बने रहने का कोई तुक नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में अल्पकालिक पूंजीगत लाभ (12 महीने की अवधि) के मामले में सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों पर 15 फीसदी कर लगता है और ऐसे शेयरों को दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ (12 महीने से अधिक की अवधि) में बेचे जाने पर कोई कर नहीं लगता।
असल में अनूकूल कर व्यवस्था इसलिए लागू की गई थी, ताकि लोगों को शेयर बाजार में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। अब जब लोग इसमें निवेश कर रहे हैं, तो अर्थशास्त्री इस आय पर कर लगाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। संभव है कि सरकार इक्विटी शेयरों की बिक्री पर कोई कर नहीं वसूले जाने की व्यवस्था पर कायम रहे, लेकिन वह एलटीसीजी की अवधि एक वर्ष से दो वर्ष कर सकती है।
बजट से ही साफ हो सकेगा कि करदाता के रूप में हमारी क्या स्थिति होगी।
वित्त मंत्री अरुण जेटली के पिछले बजटों के अनुभव से कह सकते हैं कि व्यक्तिगत कर के मामले में आयकर दाता कुछ रियायत की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन वित्तीय सुधार के लिए उनका संघर्ष जारी रहेगा और इसे उन्हें सतत जारी भी रखना होगा। असल में वित्त मंत्री को वित्तीय सुधारों के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है।