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जानना जरूरी है: शिबि ने क्यों काटकर चढ़ाया अपना मांस, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 05 May 2024 07:51 AM IST

सार

शिबि ने एक बड़ा-सा तराजू और छुरा मंगवाया। फिर उसने कबूतर को तराजू के एक पलड़े में रखा और छुरे से अपने बाएं पैर के मांस का टुकड़ा काटकर तराजू के दूसरे पलड़े में रख दिया।
 
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कबूतर - फोटो : freepic


एक दिन शिबि के दरबार में एक कबूतर उड़कर आया और शिबि की गोद में छिपकर बैठ गया। शिबि कुछ समझ पाता, उससे पहले ही एक बाज भी आ घुसा और शिबि के सामने आकर बैठ गया। बाज को देखकर कबूतर डर गया। उसने शिबि से कहा, ‘महाराज, मेरी रक्षा कीजिए! यह बाज मुझे खाना चाहता है।’


शिबि ने बाज से कबूतर को छोड़ देने का आग्रह किया। परंतु बाज भला हाथ में आया भोजन क्यों छोड़ता! उसने कहा, ‘महाराज, किसी से भोजन छीनना अधर्म है! राजा को पक्षपात नहीं करना चाहिए।’


शिबि ने कबूतर के प्राण बचाने के लिए बाज से कहा, ‘कबूतर से तुम्हारी भूख शांत नहीं होगी। मैं तुम्हें इसके बदले कोई बड़ा पशु देने को तैयार हूं।’ परंतु बाज ने शिबि की बात नहीं मानी।


शिबि ने कुछ सोचकर अंतिम प्रयास किया। ‘कबूतर को छोड़ दो; तुम जो चाहोगे, मैं तुम्हें दूंगा।’


बाज ने कहा, ‘ठीक है। यदि आप कबूतर के वजन के बराबर अपना मांस काटकर मुझे दें, तो मैं कबूतर को छोड़ सकता हूं!’


बाज की बात सुनकर शिबि स्तब्ध रह गया। फिर भी महान शिबि ने बाज की बात मान ली। शिबि ने एक बड़ा-सा तराजू और छुरा मंगवाया। फिर उसने कबूतर को तराजू के एक पलड़े में रखा और छुरे से अपने बाएं पैर के मांस का टुकड़ा काटकर तराजू के दूसरे पलड़े में रख दिया। किंतु कबूतर का पलड़ा भारी था। शिबि ने मांस का एक और टुकड़ा काटकर तराजू पर रख दिया।


कबूतर का पलड़ा अब भी भारी था। शिबि का चेहरा पीड़ा से लाल हो रहा था। कबूतर और बाज भी राजा शिबि को आश्चर्य से देख रहे थे।


शिबि ने फिर से छुरा उठाया और इस बार दूसरे पैर से मांस का टुकड़ा काटकर तराजू पर रख दिया। तराजू थोड़ा-सा हिला, किंतु कबूतर का वजन अब भी ज्यादा था। शिबि ने धीरे-धीरे अपने शरीर के विभिन्न स्थानों से इतना मांस काट दिया कि वह स्वयं मांस का टुकड़ा रह गया!


शिबि ने अपने क्षत-विक्षत तन को देखा। वह सोचता रहा कि शरीर के किस स्थान से मांस काटकर तराजू पर रखे। आखिर, जब शिबि के पास मांस नहीं बचा, तो वह स्वयं ही तराजू पर चढ़ गया। परंतु कबूतर का पलड़ा फिर भी भारी था!
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शिबि ने बाज से कहा, ‘मैं तुम्हारी शर्त पूरी नहीं कर सका, इसलिए अपनी पराजय स्वीकार करता हूं। परंतु मैं समझ गया हूं कि तुम साधारण पक्षी नहीं हो। मैं तुम्हारा असली रूप देखना चाहता हूं’


तब, कबूतर और बाज असली रूप में प्रकट हो गए। बाज के स्थान पर देवराज इंद्र और कबूतर की जगह अग्निदेव खड़े थे।


इंद्र ने शिबि से कहा, ‘महाराज, मैं आपकी परीक्षा ले रहा था और आप परीक्षा में सफल हुए हैं। मैंने जितना सुना था, आप उससे कहीं अधिक उदार और धर्म-परायण हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूं।’ फिर इंद्र ने शिबि को स्पर्श करके उसे आशीर्वाद दिया, तो शिबि पहले की तरह कांतिमय और स्वस्थ हो गया। फिर अग्निदेव ने भी शिबि को आशीर्वाद दिया, ‘महाराज, आपने जो किया है, उसके सामने धर्म और उदारता के समस्त कृत्य तुच्छ हैं। संसार में युगों-युगों तक आपकी ख्याति रहेगी!’ यह कहकर इंद्र और अग्निदेव अंतर्धान हो गए। शिबि की ख्याति सभी दिशाओं में फैली और उसने अनेक वर्षों तक धरती पर शासन किया।

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