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जानना जरूरी है: भगवान विष्णु ने क्यों मांगी तीन पग धरती, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 03 Aug 2025 06:42 AM IST

सार

देवताओं की माता अदिति ने तप कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे देवताओं को दैत्यराज बलि से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। भगवान ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


पूर्व जन्म में जुआरी के रूप में जन्म लेकर बलि ने भगवान शिव की सच्चे मन से ऐसी उपासना की थी कि उसके पुण्य और प्रताप से वह इस जन्म में शिव भक्त और महान दानी बलि बना। दैत्यराज बलि का यश इतना फैल गया कि देवता उससे भयभीत रहने लगे। एक दिन बलि अपने गुरु शुक्राचार्य और दैत्य सेनापतियों के साथ सभा में बैठा था। बलि ने दैत्यों को आदेश दिया कि पाताल लोक छोड़ पृथ्वी पर उनके पास ही निवास करें, ताकि सब दैत्य साथ मिलकर रह सकें।


शुक्राचार्य ने बलि से कहा, ‘यदि तुम्हें यही करना है, तो नर्मदा नदी के तट पर स्थित भृगुकच्छ तीर्थ पर जाकर भारतवर्ष में सौ अश्वमेध यज्ञ करो, जिससे तुम्हें उत्तम फल की प्राप्ति होगी।’ बलि ने अपने गुरु की आज्ञा मानी और भृगुकच्छ तीर्थ पर जाकर निन्यानवे अश्वमेध यज्ञ पूरे कर लिए। बलि का सौवां यज्ञ भी आरंभ हो चुका था। इधर, देवताओं की माता अदिति ने कठोर तप करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे दैत्याराज बलि से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।


अदिति की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनके पुत्र रूप में जन्म लिया। फिर वामन रूप में विष्णु, बलि के यज्ञ में पहुंचे। उन्हें देख बलि विस्मित रह गया। वामन ने बलि से कहा, ‘राजन! मुझे तीन पग भूमि चाहिए।’


बलि ने हंसकर कहा, ‘ब्रह्मचारी! तीन पग क्यों? मैं आपको पूरी पृथ्वी दान में दे सकता हूं।’ परंतु वे तीन पग भूमि पर ही अड़े रहे। आखिर बलि ने तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। यह देख शुक्राचार्य ने बलि को समझाया, ‘यह साधारण ब्रह्मचारी नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं। ये तुमसे इंद्र का राज्य वापस लेने आए हैं और तुम्हारे यज्ञ में विघ्न डालेंगे।’ परंतु बलि वचन से पीछे नहीं हटा। उसने कहा, ‘विष्णु स्वयं संपूर्ण कर्मों और उनके फलों के स्वामी हैं। इन्हें दान देना मेरे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है।’ गुरु की अवज्ञा करने के लिए शुक्राचार्य ने बलि को शाप दे दिया कि राज्य लक्ष्मी बलि से दूर हो जाएगी। बलि ने शांत भाव से शाप को स्वीकार किया और वामन को भूमि देने को तैयार हो गया।


बलि ने जैसे ही वामन देवता को वचन दिया, उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में पृथ्वी, दूसरे पग में आकाश और ऊर्ध्व लोक माप लिए। अब वामन के पास तीसरा पग रखने के लिए स्थान ही नहीं बचा था। इस तरह गुरु शुक्राचार्य के शाप के कारण बलि का समस्त वैभव और राज्य लक्ष्मी भगवान विष्णु ने अपने अधिकार में ले ली। उसी समय बलि की पत्नी विन्ध्यावलि वहां पहुंच गई और उसने भगवान विष्णु से कहा, ‘देव! मेरे स्वामी ने आपको तीन पग भूमि देने की प्रतिज्ञा की है। यदि आपको देने के लिए भूमि बाकी नहीं है, तो आप तीसरा पग मेरे पति के मस्तक पर रखकर दान स्वीकार कीजिए।’ बलि ने भी अपना मस्तक वामन रूप में आए विष्णु के सामने झुका दिया।


बलि की नि:स्वार्थ भक्ति और त्याग से प्रसन्न वामन बोले, ‘मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं, वर मांगो।’ बलि ने कहा, ‘प्रभो! मुझे आपके चरणों की अटल भक्ति चाहिए।’ भगवान ने कहा, ‘मैं तुम्हें अमरता का वरदान देता हूं और तुम सुतल लोक में निवास करो। वहां मैं स्वयं तुम्हारा द्वारपाल बनाकर रहूंगा।’ इस तरह बलि को अमरता प्राप्त हुई और वह समस्त दैत्यों के साथ सुतल लोक में रहने लगा। भगवान विष्णु ने बलि के द्वारपाल का कार्य संभाल लिया। कहते हैं, बलि के द्वार पर जाने वाले याचकों को द्वारपाल के रूप में भगवान विष्णु, आज भी इच्छानुसार फल प्रदान करते हैं।

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