इंद्र का पुत्र जयंत भी सभा में विराजमान था। हालांकि, यह बात बहुत कम लोग जानते थे कि जयंत और उर्वशी एक-दूसरे से प्रेम करते थे। परंतु उस दिन उनसे भूल हो गई। अगस्त्य के आसन ग्रहण करते ही संगीत का कार्यक्रम आरंभ हो गया। नारद ने वीणा पर मधुर तान छेड़ी, तो उर्वशी के पैर संगीत की ताल पर थिरकने लगे। नारद की वीणा में रागिनियां बसती थीं और उर्वशी के नृत्य में भी जादू था। नारद और उर्वशी का तालमेल अद्भुत था।
इंद्र सहित समस्त देवी-देवता और अगस् त्य मंत्रमुग्ध होकर कार्यक्रम का आनंद ले रहे थे। किसी का ध्यान इस पर नहीं गया कि उर्वशी, तिरछी नजरों से जयंत को भी देख रही थी।
जयंत की आंखें मादकता से भारी होने लगीं। वह उर्वशी को निहार रहा था। तभी कुछ ऐसा हुआ कि स्थिति पलट गई। नृत्य के बीच में जैसे ही उर्वशी की दृष्टि जयंत पर गई, तो वह कामातुर हो उठी और परिणामस्वरूप उसका ध्यान भटक गया। उसके पैरों का तालमेल बिगड़ने लगा। नारद ने तुरंत उर्वशी की त्रुटि पकड़ ली। उन्हें इसका कारण समझते भी देर नहीं लगी। परंतु भरे दरबार में सबके सामने कुछ कहना उचित नहीं था। इसलिए नारद ने वीणा की ताल बदलकर उसे उर्वशी के लड़खड़ाते कदमों के साथ मिलाने का प्रयास किया।
परंतु उर्वशी का ध्यान ऐसा भटका कि वह फिर संभल ही नहीं पाई। देवर्षि नारद ने बहुत प्रयास किया, परंतु बात नहीं बनी। आखिरकार, उर्वशी के नृत्य और नारद के संगीत के बीच बिगड़ते सामंजस्य पर महर्षि अगस्त्य का ध्यान चला गया। उन्होंने उर्वशी और जयंत के बीच आंखों-आंखों में चल रहे संकेत भी देख लिए थे। महर्षि अगस्त्य को उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोध आ गया। उन्हें इंद्र के दरबार में अपने सामने चल रहा यह नाटक अपमान की तरह प्रतीत हुआ। अगस्त्य स्वयं को रोक नहीं सके। महर्षि ने पहले नारद से कहा, ‘देवर्षि! आपसे मुझे ऐसी आशा नहीं थी। आप उर्वशी की भूल को सुधारने के बजाय स्वयं भी उसके साथ मिलकर भूल कर बैठे। आपकी वीणा दिव्य है, लेकिन आपने इसका तिरस्कार किया है।
इसलिए मैं शाप देता हूं कि आज से आपकी वीणा, जन-साधारण का वाद्य बनकर रह जाएगी।’ यह सुनकर नारद बहुत लज्जित हुए। उन्होंने महर्षि अगस्त्य से क्षमा मांगी और शाप वापस लेने का अनुरोध किया, लेकिन देर हो चुकी थी। महर्षि ने शाप वापस लेने से मना कर दिया। फिर उन्होंने उर्वशी से कहा, ‘हे अप्सरा! तुम्हें अपने रूप पर बहुत गर्व है। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम्हें पृथ्वीलोक पर देवदासी बनकर जन्म लेगा होगा!’ उर्वशी यह सुनकर बहुत दुखी हुई, लेकिन वह महर्षि अगस्त्य के सामने असहाय थी।
इसके बाद महर्षि, जयंत की ओर देखते हुए बोले, ‘जयंत! तुम तो देवराज इंद्र के पुत्र हो फिर तुमने अपना विवेक कैसे खो दिया? तुम अपने पिता के दरबार में उन्हीं के सामने बैठकर अप्सराओं को रिझाते हो? मैं तुम्हें भी शाप देता हूं कि तुम वेणु (बांस) बनकर पृथ्वी पर जन्म लोगे।’ यह सुनकर उर्वशी और जयंत ने महर्षि से क्षमा मांगी। तब अगस्त्य ने कहा, ‘देवदासी के रूप में उर्वशी जब मंच पर अपना पहला नृत्य (आंगेत्रम) प्रस्तुत करेगी और इसे पुरस्कार में वेणु प्रदान किया जाएगा, तब उर्वशी और जयंत को मेरे शाप से मुक्ति मिल जाएगी।’ इस तरह नारद, उर्वशी और जयंत को उनकी त्रुटियों के लिए शाप देकर महर्षि अगस्त्य, देवराज इंद्र की सभा छोड़कर चले गए।