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घासीराम का शीर्षक क्यों बदला?

Sat, 02 Mar 2013 11:08 PM IST
यशवंत व्यास
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शीर्षक को लेकर लेखक बहुत ज्यादा संवेदनशील होता है। खासतौर पर यदि कविता हुई तो उसे लगता है, अर्थ चला गया। कहानी का शीर्षक भी इस आग्रह का पूरा मान करता है। मगर रोजाना के अखबार में जो लेख छपते हैं, उनके शीर्षकों पर संपादक का जोर चलता है। संपादक तो संवेदनशील होता ही है, अखबार का समीक्षक उससे भी ज्यादा संवेदनशील होता है।
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बाज वक्त लेखक बहुत सही शीर्षक ठोकते हैं, लेकिन संपादक का मन हुआ तो उसे बदलेगा और बदलकर रहेगा। हमारे एक मित्र थे। उन्हें जे. ओमप्रकाश और मोहनकुमार के अलावा अर्जुन हिंगोरानी बहुत पसंद थे। पहले दो फिल्मकार ‘ए’ से अपनी फिल्मों के नाम रखने के लिए मशहूर हैं। तीसरे सज्जन को ‘के’ पसंद है। इसलिए संपादक मित्र की तलाश रहती थी कि कोई ‘कातिलों का कातिल’ नुमा शीर्षक पकड़ा जाए।

आवरण कथाएं उनके हाथ पड़ती तो ‘ए’ से या ‘के’ से ही शीर्षकवान बनतीं। एक दफा उन्हें इन अक्षरों से शुरू होने वाला शीर्षक नहीं मिला तो इतने डिप्रेशन में आ गए कि उन्होंने अगले तीन अंकों तक शीर्षकों की तरफ देखा ही नहीं। ‘ए’, अंबानी के लिए और ‘के’ किर्लोस्कर के लिए भी होता है। बाद में उन्हें लगा कि इन दो लोगों के लिए वे काम करते तो हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उनका नाम सबसे ऊपर जाता। यह सोच जारी रही और वे इतिहास में अंततः जाकर माने। आजकल वे इतिहास ही हो गए हैं।
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कुछ संपादक बहुत भले होते हैं। वे वर्तनी की अशुद्धि भी देखना लेखक-विरोधी काम समझते हैं। इसलिए कई बार जयशंकर प्रसाद को ‘ए सुटेबुल बॉय’ का लेखक लिखा जा रहा हो, तो भी वे तटस्थ बने रहते हैं। इन संपादक मित्रों के बनाए हुए कई विक्रम सेठ इधर-उधर हिंदी पत्रकारिता की सेवा में लिपस्टिक लगाने के तरीके सुझाते मिल जाएंगे। या फिर समकालीन अखबारों के शीर्षकों पर लंबी समीक्षा के व्यवसाय में लगे मिलेंगे।

कुछ संपादक दुष्ट होते हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे शीर्षक बदलेंगे। पैराग्राफ में कसावट लाएंगे। तथ्यों की गलती सुधार देंगे और आखिरी प्रूफ भी देखेंगे। ऐसे संपादक श्रेष्ठतम शीर्षक और उत्कृष्ट ‘इंट्रो’ के मारे सो तक नहीं पाते और निरंतर एक तलाश में लगे रहते हैं। अब जैसे आप इसी लेख का शीर्षक देखें। इसमें लिखा है - ‘घासीराम का शीर्षक क्यों बदला?’

इससे आभास होता है कि लेख में नायक घासीराम की उस व्यथा का जिक्र होगा, जो शीर्षक बदलने से घटित हुई है। किंतु ऐसा है नहीं। चाहे तो संपादक इसका शीर्षक बदल सकता है। वह कुछ और लिखकर ‘अच्छी हिंदी’ का कॉलम पढ़ने की राय देगा। मगर घासीराम नाराज हो जाएंगे। कई लेखक, जिनका नाम संयोगवश घासीराम भी हो सकता है, यदि अपने लेख का शीर्षक बदलने पर नाराज होते हैं, तो उसके पीछे उनका यह कृपा-भाव भी होता है कि भैया, जब हमने अपनी मेहनत कर ली तो तुम खामख्वाह अपना वक्त क्यों बिगाड़ रहे हो?

इसमें दो राय नहीं कि मार्के के शीर्षक देने वाले रचनाशील संपादक बहुत प्यार करने वाले हैं और अपने लिए शीर्षक को अंतिम शीर्षक समझने वाले घासीराम मनन करते-करते इतिहास में चले जाते हैं। लेकिन कई बार शीर्षकों का संकट आ जाता है। जैसे आप ‘मुहावरा आधारित’ शीर्षकों के शौकीन संपादक से मिलें, तो वे मुहावरा कोष के बेकार होने की शिकायत करते मिलेंगे। ट्रैक बदलकर देखें तो राजनीति में पार्टियों के नाम रखने की मुसीबत पर जाइए। जब से जनता पार्टी का विघटन हुआ, रोज मोर्चों और पार्टियों के शीर्षक ढूंढ़ना मुश्किल काम हो गया है।

हिंदी पत्रकारिता में कलगीतुर्रे वाले विशेष शीर्षकों का लफड़ा जबसे शुरू हुआ, लगभग उसी समय राजनीति में नैतिकता और नए शीर्षकों का महाअकाल आरंभ हो गया था। हमारे एक संपादक मित्र ने तो राय दी है कि कोई एजेंसी खोल लें, जिसमें फीस लेकर पार्टियों और नेताओं को नए तथा मारक शीर्षक सप्लाई करने की धुआंधार व्यवस्था हो। इसमें लेखन से ज्यादा आर्थिक संभावनाएं हैं। उधर साहित्य में अजीबो-गरीब शीर्षकों के सम्मोहन का पी.सी. सरकारनुमा एक संप्रदाय है ही, जो एक हजार किलोमीटर लंबे शीर्षक लिखने में मशहूर है। पत्रकारिता में अभी शीर्षक क्रांति हुई नहीं है। यहां पी.सी. सरकारों का पर्सनल कंप्यूटर से तालमेल होता रहा है।

कई घासीराम हैं, जो तन्नाए हुए हैं। वे अभी भी अपने लेख का शीर्षक बदल जाए तो संपादक को एक लाख गालियां, लेख की जगह लिख भेजें। लेकिन कंप्यूटर और ले-आउट के जमाने में जहां शब्द संख्या जान लेने पर तुली हो, घासीराम का शीर्षक बदल सकता है और बदलता रहेगा। जाकर बिल गेट्स से पूछो कि बेटा, कंप्यूटर पर क्वार्क एक्सप्रेस का यह वर्जन तूने क्यों बदला?
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