एक छोटी लड़की जब भी मीना कुमारी की फिल्म देखती, तब अपनी मां से पूछती कि यह औरत हमेशा रोती क्यों रहती है। मां अपनी बेटी को देखती और बहुत ही भावुक अंदाज में जवाब देती, यह सिनेमा की बड़ी हीरोइन है, मीना कुमारी। यह जितना पर्दे पर दर्द के साथ जीती है, उससे ज्यादा दर्द इनके अपने जीवन में है। मां के हर जवाब में दर्द की ही चर्चा होती थी। उसी दर्द ने उस छोटी सी लड़की रूबी एस साइने को बांध लिया।
दिल्ली की यह लड़की जब बड़ी होकर एक्टिंग में आई तो सबसे पहले मीना कुमारी को ही अपनी आंखों के सामने रखा। मुंबई आकर उसने फिल्म इंडस्ट्री के बुजुर्ग लोगों से मिलकर मीना कुमारी की जिंदगी के बारे में जानने की कोशिश की। मीना कुमारी पर लिखी मधुप शर्मा की किताब को कई बार पढ़ा। मीना जी का जो दर्द रूबी के बचपन से चिपका था, वह एक नाटक में तब्दील हो गया-‘एक तनहा चांद’।
मुंबई के बांद्रा स्थित रंग शारदा थियेटर में जब ‘एक तनहा चांद’ का मंचन हो रहा था, पूरा थियेटर खामोश था। अगर कुछ आवाजें थीं भी तो दर्शकों की आंखों में जमे आंसू की, आह की और मीना कुमारी बनी रूबी एस साइने के डायलॉग की, कमाल अमरोही के थप्पड़ की, इंडस्ट्री के विश्वासघात और मौत के स्वीकार की। दर्शकों की आंखें तब भींगी जब महजबीं को अपने ही परिवार ने ठुकरा दिया।
जब दादर इलाके की एक औरत प्रभादेवी ने फूल सी बच्ची को सड़क से उठाया और अपनी बेटी की तरह पाला। जब एक डूबती हुई फिल्म को बनाने के लिए मीना कुमारी ने पैसे लेने से मना कर दिया। जब उन्होंने गजल, नज्म की लिखी हुई अनगिनत डायरियां गुलजार को सौंप दीं। जब झूठे वादे और बेईमान चेहरों ने इन्हें परेशान किया, जब मौत का इंतजार करते हुए भी वह लगातार ‘पाकीजा’ को पूरा करने के बारे में सोचती रहीं और पूरा किया। इसलिए कि पाकीजा में मीना कुमारी की रूह बसती थी।
उन्हें अपनी जिंदगी से बहुत प्यार था, मगर कहती थी, मैं अपनी जिंदगी में कई बार मरी। मगर दफनाई एक ही बार जाऊंगी। नाटक में पूरी तसल्ली के साथ इस बात को स्थापित किया गया है कि एक सफल एक्ट्रेस का एक स्ट्रगलर कमाल से शादी करने का फैसला प्यार पाने का सपना था। मगर कमाल उन्हें अपनी पत्नी से अधिक एक सफल हीरोइन के रूप में देखते थे, जो उन्हें निर्देशक बना सकती थी।
कहा भी गया कि मीना साहिबजान (पाकीजा) नहीं होती तो कमाल अमरोही इतिहास के पन्नों पर नहीं होते। नाटक की पूरी परिकल्पना, स्क्रिप्ट और निर्देशन का जिम्मा रूबी ने ही उठाया, क्योंकि वह मीना कुमारी को खुद से बेहतर जानती हैं। उनका पूरा जीवन नाटक में दिखा पाना संभव नहीं था। मगर टुकड़े-टुकड़े में जो भी दिखाया, वह भी एक महागाथा से कम नहीं है। उनकी ही फिल्मों के गानों से उनके जीवन की कथा बुनी गई।
‘अंदाज तेरा मस्ताना’..., ‘इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा’..., ‘न जाओ सैंय्या छुड़ा के बैय्यां’..., ‘चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था’,... ‘आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे’... गानों को जोड़कर मीना कुमारी के जीवन को दिखाने की अद्भुत कोशिश की रूबी ने। रूबी एस साइने का यह महत्वाकांक्षी शो है। इसे वह देश के हर शहर में ले जाना चाहती हैं। स्काई वॉक थियेटर ग्रुप बनाकर अपना काम कर रही हैं। कहती हैं, मीना कुमारी हर औरत में है।
हर औरत दर्द में भी मुस्कुराती रहती है। वह मेहनती है और पावरफुल भी। रूबी इससे इंकार करती हैं कि वह मीना कुमारी के दर्द की नुमाइश कर रही हैं। वर्ष 2012 में एक अगस्त को मीना जी के जन्मदिन पर नाटक को लांच किया गया था। इस साल 29 मार्च को उनकी 40वीं पुण्यतिथि पर वह दादर में शो करेंगी, जहां मीना जी पली-बढ़ी। सबसे ऐतिहासिक बात तो यह है कि हिंदी सिनेमा के100वें साल पर लोग मीना कुमारी को नाटक के मंच पर देख रहे हैं। सच ही कहा मीना जी के घर काम करने वाले सेवक ने ‘हमारी बच्ची वहां चली गई, जहां न किसी बात का दुख है और न गम।’ वह मौत का इंतजार भी मुस्कुराकर करती थीं, मानों आजाद होना चाहती थीं जिंदगी से।