अमेरिका के कटु आलोचक भी इस पुरानी कहावत को मानेंगे कि अमेरिका के लिए न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और न कोई स्थायी दोस्त। उसके लिए एक ही चीज स्थायी है, अमेरिका का राष्ट्रीय हित। हालांकि बदलते समय के साथ उसका पुनर्मूल्यांकन एवं पुनर्व्याख्या हो सकती है। दशकों तक उन्होंने चीन की अनदेखी की और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ताइवान को उसकी जगह रखा। लेकिन बाद में अमेरिका ने चीन के प्रति अपने रवैये में ऐतिहासिक बदलाव किया।
दुनिया का एकमात्र देश, जिसने अमेरिका को परास्त किया और 58,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की लाश भेजी और जिसे उन्हें अप्रैल, 1975 में बेहद अपमानजनक स्थितियों में खाली करना पड़ा था, वह वियतनाम है। लेकिन आज अमेरिका और वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता का सामना करने के लिए एक ही नाव में सवार हैं। वह वियतनाम का सबसे बड़ा व्यावसायिक भागीदार है।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान से सोवियत रूस को बाहर निकालने के लिए अमेरिका ने तालिबान को तैयार करने में मदद की। लेकिन वही अमेरिका अफगानिस्तान से तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए 2001 से तालिबान के खिलाफ जंग लड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र तालिबान को आतंकी संगठन मानता है, फिर भी ओबामा को कथित ‘अच्छे तालिबान’ से बात करने में हिचक नहीं है, क्योंकि उन्हें शीघ्र ही अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाना है।
इस पृष्ठभूमि में, 2002 के गुजरात दंगे में नरेंद्र मोदी की कथित भूमिका के कारण वर्षों तक उन्हें वीजा नहीं देने और अब उनके स्वागत के प्रति उत्सुकता दिखाने के अमेरिकी रवैये से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। पर्याप्त बहुमत के साथ चुने गए भारत के नए प्रधानमंत्री का अपनी पार्टी में भी वर्चस्व है। जाहिरा तौर पर कम से कम अगले पांच वर्षों के लिए वह भारत के निर्विवाद नेता हैं और अमेरिका उनके साथ रिश्ते बढ़ाने और व्यापार करने के लिए तैयार है।
जाहिर है, मोदी शासन में व्यावसायिक संभावनाएं ही भारत-अमेरिकी रिश्ते की मूलाधार होंगी, हालांकि अफगानिस्तान, दक्षिण चीन सागर, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, ग्लोबल वार्मिंग, संयुक्त राष्ट्र में सुधार जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाया जाएगा। यह दोनों देशों के लिए लाभदायक स्थिति है। इसलिए जब नरेंद्र मोदी सितंबर में बराक ओबामा से ह्वाइट हाउस में मिलेंगे, तो वह आत्मविश्वास से भरे होंगे।
भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के लिए अमेरिका के दोनों दल सहमत हैं। भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की प्रक्रिया डेमोक्रेट राष्ट्रपति क्लिंटन द्वारा शुरू की गई थी, जिसे आगे बढ़ाने में रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अभूतपूर्व योगदान दिया। इसी तरह, भारत में भी अमेरिका के प्रति कांग्रेस और भाजपा के रवैये में कोई बुनियादी फर्क नहीं है, चाहे परमाणु जवाबदेही का मसला हो, या रिटेल में एफडीआई और बीमा, शिक्षा, पेंशन आदि क्षेत्रों को अमेरिकी निवेश के लिए खोलने का मसला हो।
निश्चित रूप से मोदी के सक्रिय दृष्टिकोण की वजह से फैसले लेने और उसके निष्पादन में अंतर जरूर होगा। मोदी गठबंधन के साथियों पर निर्भर नहीं हैं। भारत-अमेरिका रिश्ते को आकार देने के लिए उन्हें अपने दो पूर्ववर्तियों से ज्यादा छूट मिली हुई है।
इसके अलावा उन्होंने अपनी त्वरित गति के साथ काम करने वाले व्यावहारिक, विचारशील और दृढ़ नेता की छवि बनाई है, जो न केवल व्यवसाय हितैषी है, बल्कि नौकरशाही की लालफीताशाही को ध्वस्त करने और फैसले को लागू करने में भी सक्षम है। यह अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत की आर्थिक नीतियों, उनकी निरंतरता और कराधन कानून के बारे में आश्वस्त करेगा। पहले से ही फल-फूल रहे रक्षा व्यापार के भी आगे बढ़ने के संकेत हैं। हालांकि दोनों पक्षों के पास शिकायतों और निराशाओं की सूची लंबी है, लेकिन ये मुद्दे दुष्कर नहीं हैं। इन्हें दूर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और वास्तविक दिलचस्पी चाहिए। शीर्ष नेताओं के राजनीतिक दबाव (जैसे कि परमाणु समझौते पर जॉर्ज बुश एवं मनमोहन सिंह ने किया था) के बिना रणनीतिक भागीदारी केवल कागजों पर ही रहेगी।
दो परिपक्व लोकतंत्र होने के नाते भारत और अमेरिका को सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर स्पष्ट रूप से बात करनी चाहिए और उन्हें हल करने के तरीके और साधन तलाशने चाहिए। भारत बहुत विशाल, विविधतापूर्ण और स्वतंत्र देश है, जिसे कोई आदेश नहीं दे सकता। उधर आर्थिक मंदी के बावजूद अमेरिका अब भी महाशक्ति देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था भारत से छह गुनी बड़ी है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, नवाचार, अंतरिक्ष, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान, प्रदूषण नियंत्रण, शिक्षा, आधारभूत ढांचा और कृषि के क्षेत्र में संभावित सहयोग के लिए भारत को उसका विकल्प नहीं मिल सकता। इसके अलावा, अमेरिका के साथ बेहतर रिश्ता होने से अन्य विकसित देशों के साथ रिश्तों पर भी असर पड़ेगा।
दूसरी तरफ अमेरिका को भी भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने के लिए चापलूसी के मुहावरे से आगे बढ़ना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत के साथ रिश्ते में बेहतरी के लिए प्राथमिकता के आधार पर ध्यान, समय एवं ऊर्जा खर्च करनी होगी। भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूदा गिरावट से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। मोदी जैसे निर्णायक प्रधानमंत्री के साथ भारत के विकास की कहानी थमने वाली नहीं है, बल्कि भारत वापस विकास के पथ पर जाने के लिए बाध्य है। भारत के विशाल बाजार की उपेक्षा कौन कर सकता है? यहां के महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग में हर अमेरिकी चीज के प्रति भूख है। हर बुराई का आरोप अंकल सैम पर मढ़ा जाता है, लेकिन अमेरिकी चीजों को लपका जाता है!
ओबामा का मोदी को फोन करना, केरी की सुषमा स्वराज से बातचीत और निशा बिस्वाल की यात्रा-इन सबका एक ही संकेत है कि अमेरिका भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी को इन हाथों को थाम लेना चाहिए। यह दोनों देशों के व्यापक हित में होगा।