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भावनाएं इतनी आहत क्यों होती हैं

Thu, 06 Aug 2015 07:37 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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सिर्फ सुना है कि ये जो कमबख्त भावनाएं होती हैं न, जरा से में आहत हो जाती हैं। उधर किसी ने कुछ ऊंचा-नीचा किया नहीं कि इधर हो गई भावनाएं आहत। ऐसा भी नहीं है कि एक बार आहत हो गईं, तो फिर साल-छह महीने की छुट्टी। इधर आहत होकर निपटे नहीं कि उधर फिर भावनाएं तैयार हैं आहत होने के लिए। कितनी बेशर्म हैं भावनाएं, जो इतनी-इतनी बार आहत होने के बाद भी हत नहीं होतीं।
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हमें पता ही नहीं चलता और हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं। क्या पता, हम सोते ही रह गए हों और उधर भावनाएं लहूलुहान हो गईं। सच कहें, तो मुझे कभी लगा ही नहीं कि मेरी भावना आहत भी हुई है। भला हो उन लोगों का, जो समय-समय पर बताते रहते हैं कि लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। कई बार कोशिश की। अभी-अभी बजरंगी भाईजान भी इसी गरज से देख डाली कि कहीं तो पता चले कि भावना किस हाल में है। हफ्ते भर बाद किसी ने बताया कि भावनाएं आहत हो गई हैं। कोई साफ संकेत तो हमें नहीं मिल रहे, मगर कहा है, तो जरूर हो गई होगी। लोग भला झूठ क्यों बोलेंगे? भावनाओं को समझना हर एक के बस की बात नहीं है। कम से कम मेरे जैसे आम आदमी के लिए तो बिल्कुल नहीं।

किसी ने एक बार पूछ लिया था कि भावना कभी आहत हुई या नहीं, तो गहन-गंभीर चिंतन के बाद हमने उसे बताया था कि हां, हुई थी, जब उसका प्रेमी, उसकी ही सहेली के साथ घर से भाग गया था, तब बहुत आहत हुई थी भावना। बस, उसके बाद किसी ने नहीं पूछा या हमें इस लायक ही नहीं समझा। बस इसी बात की हर बार खुशी रहती है कि भले सुबह-शाम आहत हो रही हो, मगर इस मायावी दुनिया में भावनाएं अभी तक जिंदा हैं। यह भी भावना का ही कमाल है कि अपने बूते जिंदा बची है, वरना आहत करने वालों ने तो उसका भी राम नाम सत्य कर ही दिया था। इस समय देश की अदालत में हत्या के कम और भावनाओं के आहत होने के केस इसीलिए ज्यादा चल रहे हैं कि हमारा देश भावना-प्रधान है।
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