वह जिद पर अड़ गए थे कि चूल्हे पर रोटी सेंककर ही रहेंगे। उन्हें समझाया गया कि मौके के तवे पर राजनीति की रोटियां आप भले सेंकते रहे हों, पर असल चूल्हे से असली रोटी उतारना आसान नहीं है। माना कि गैस महंगी हो गई है, पर इतनी भी नहीं हुई कि गैस के चूल्हे की जगह लकड़ी-कंडे पर रोटियां सेंकने लगें। उन्हें तो आइडिया जम गया था कि अगर उन्होंने चूल्हे से रोटी उतार दी, तो लोगों की निगाह से सरकारी पार्टी भी उतर जाएगी।
उन्हें समझाया गया कि पारंपरिक ऊर्जा स्रोत यानी लकड़ी-कंडे के चूल्हे पर रोटी सेंकने के लिए जमीन से जुड़ना पड़ता है। उन्हें याद दिलाया गया कि तीस साल पहले जब वह चुनाव में खड़े हुए थे, उसके बाद जमीन पर नहीं बैठे। सो इस विषम शारीरिक हालत में उनका जमीन से संपर्क खतरनाक हो सकता है।
किसी ने सुझाव दिया कि रोटी सेंकने का काम ‘भाभीजी’ कर लें और आप वहीं खड़े-खड़े रोटी खाकर दिखा दें कि असली है। यह विचार इसलिए नहीं पक सका कि भाभीजी ने भी सदियों से रोटी नहीं बनाई है। जो विधायक का चुनाव लड़ने की तैयारी में हो, वह रोटी के चक्कर में कहीं पड़ती है!
मौका हाथ से निकल न जाए, यही डर उन्हें खाए जा रहा था और इसीलिए वह बेताब थे कि रोटी सेंककर रहेंगे। यह कल्पना करते ही उनके चेहरे पर फूली हुई रोटी की रंगत तैरने लगती।
विचार आया कि नेताजी ने अगर लकड़ी-कंडे के चूल्हे पर रोटी बना ली और जनता को यह आइडिया जम गया, तो क्या होगा! जब उसे गैस की जरूरत ही नहीं होगी, तो बढ़ती महंगाई से क्या फर्क पड़ने वाला है। यह तो एक तरह से जनता को आसान विकल्प सुझाना हो जाएगा। सरकार तो चैन की सांस लेने लगेगी।
इसीलिए मेरे इलाके में नेता ने रोटी नहीं सेंकी। यह पहला मौका था कि चाहकर भी वह रोटी नहीं सेंक सके। यह भी अफसोस रहा कि गांववाली को राजधानी में ले आते, तो आज रोटी सेंकने के काम तो आती!