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उम्मीदों के साये में नई शुरुआत

Thu, 18 Sep 2014 08:50 PM IST
चिंतामणि महापात्र
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों के मद्देनजर काफी उम्मीद के साथ देखा जा रहा है, और यह ठीक भी है। चीन हमारा पड़ोसी मुल्क है। दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय से समस्याएं बेशक बनी हुई हैं, मगर भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि चीन एक उभरती हुई विश्व शक्ति है। ऐसे में, तमाम मतभेदों को दरकिनार करते हुए उसके साथ दोस्ती भारत के भी हित में है। मगर यह तभी मुमकिन है, जब दोनों देशों के बीच इसी तरह की उच्च स्तरीय वार्ताएं होती रहें।
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इसे ध्यान में रखते हुए चीन को लेकर नरेंद्र मोदी की सरकार जिस ईमानदारी से कदम आगे बढ़ा रही है, उसमें एक संतुलन दिख रहा है। मोदी ने खुद स्वीकार किया है कि दोनों देश आर्थिक और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और इसलिए यह बहुत जरूरी है कि दोनों में सहयोग हो। लेकिन इसके लिए उन्होंने सीमा पर शांति को बहुत जरूरी बताया है। सरहद पर शांति होगी, तभी दोनों देशों के बीच रिश्तों की सारी संभावनाएं साकार हो सकेंगी।

चीन के प्रति नरेंद्र मोदी की नीति की तुलना पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीति से नहीं की जा सकती। दोनों देशों के आज के संबंधों को नेहरूयुगीन नीतियों के संदर्भ में देखा भी नहीं जा सकता। चीन को लेकर नेहरू की नीति पर होने वाली सभी चर्चाएं चीन के धोखे तक सिमट कर रह गईं। इस पर जिस तरह बहस होनी चाहिए थी, वैसी अब तक नहीं हो पाई है। फिर भी आज के संदर्भ में दोनों देशों के रिश्तों पर चर्चा करते हुए हमें नए नजरिये से काम लेना होगा। सीमा पर घुसपैठ कोई नई बात नहीं है। 1962 से यही सब चल रहा है। पर आज दोनों देशों की स्थितियों में काफी अंतर आ गया है। आज दोनों दुनिया की सबसे तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं, और दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्र हैं। तमाम मतभेदों के बावजूद दोनों देशों के बीच युद्ध होने की आशंका तो बिल्कुल नहीं है। दोनों देश नेहरू के दौर से काफी आगे बढ़ चुके हैं और एक दूसरे के महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोगी हैं। पर्यावरण समेत विभिन्न मामलों में गठित तमाम विश्वस्तरीय समितियों में दोनों एक-दूसरे का सहयोग भी कर रहे हैं। मतभेद अपनी जगह हैं। भारत चीन के इरादों पर संदेह करता है, और चीन अमेरिका के साथ भारत की नजदीकी को शंका की नजर से देखता है। यानी दोनों देशों के रिश्तों में कुछ नकारात्मक चीजें जरूर हैं, मगर आज इनमें सकारात्मकता की भी कोई कमी नहीं है।
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जिनपिंग की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच उम्मीदों का एक माहौल तैयार हो रहा है। हालांकि चीन की चालाकियों को ध्यान में रखते हुए भारत की सतर्कता भी समझी जा सकती है। सुषमा स्वराज पहले ही कह चुकी हैं कि तिब्बत को लेकर चीन की चिंताओं से भारत अच्छी तरह वाकिफ है। ऐसे में, अगर चीन चाहता है कि भारत 'एक चीन' के विचार का समर्थन करे, तो उसे भी भारत की एकता को स्वीकार करना पड़ेगा।

हालांकि इस दौरान चीन जरूरत से ज्यादा जो चालाकी कर रहा है, उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती। गौरतलब है कि एक ओर तो दोनों नेताओं की वार्ता चल रही है, तो दूसरी ओर हमारी सीमा पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ जारी है। दरअसल अतीत को देखते हुए कहा जा सकता है कि चीन का रवैया हमेशा से कुछ अजीब (टिपिकल चाइना) रहा है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार को देखते हुए यह नहीं माना जा सकता कि उनकी पीएलए सीमा पर घुसपैठ करती रहे, और उनके राष्ट्रपति जिनपिंग को इसकी कोई जानकारी ही न हो। इसके पीछे उनकी मंशा भारतीय मीडिया को बहलाने की हो सकती है। भारतीय मीडिया में चीन विरोधी जो लहर चलती रहती है, उससे निपटने के लिए ही उसने यह नीति अपनाई हुई है।

यानी इसके जरिये वह भारतीय मीडिया से कह रहे हैं कि सीमा विवाद लंबे अरसे से उनके देश के लिए भी उतनी ही बड़ी समस्या बना है, जितना भारत के लिए। और इसकी वजह वह दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का ठीक ढंग से निर्धारण न हो पाना बता रहे हैं। वह यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत में घुसपैठ का उनका कोई इरादा नहीं है और चीन भी वार्ता के जरिये भारत के साथ सारे मतभेदों को सुलझाने की मंशा रखता है। यह भी हो सकता है कि उनकी पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) वह न चाहती हो, जो जिनपिंग चाहते हैं। दरअसल चीन में नीति निर्माण की प्रक्रिया में कई तरह के संस्थान शामिल हैं। फिर पीएलए का चीन में जो प्रभाव है, उसे देखते हुए यह भी मुमकिन है कि कम्युनिस्ट पार्टी और पीएलए में भारत के संदर्भ में नीति को लेकर दरार हो, और इसी वजह से चीनी सेना अपने राष्ट्रपति को यह संदेश देना चाह रही हो कि उनकी भारत यात्रा के दौरान सीमा विवाद को लेकर कोई सार्थक नतीजा निकलना मुमकिन नहीं है।

दूसरी ओर एशियाई राजनीति के संदर्भ में मोदी और जिनपिंग की मुलाकात का खासा महत्व है। दोनों देशों ने एशिया में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए आपसी रणनीतिक सहयोग की जरूरत पर बल दिया है। एशिया में स्थायित्व और आर्थिक उन्नति के लिए यह जरूरी है कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर बने रहें। फिर जापान भी दूसरे एशियाई देशों पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इससे चीन और जापान में जिस तरह की प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है, वह भी भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है। जापान के साथ भारत की नजदीकी में चीन के लिए एक कूटनीतिक संदेश छिपा हुआ है।
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(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)
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