कोल ब्लॉक आवंटन से संबंधित कथित अनियमितताओं के मामले में एच सी गुप्ता जैसे बेहद ईमादार सिविल सेवक के खिलाफ मुकदमे से उन तमाम सिविल सेवकों, राजनेताओं और बुद्धिजीवियों को झटका लगा है, जो राष्ट्र कल्याण के प्रति चिंतित हैं। हमारी संस्थाओं की ईमानदार लोकसेवक तैयार करने की क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हरीश जैसे लोगों के पास जेल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, क्योंकि खुद को बचाने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। इस घटना का संकेत हमारी राज्य-व्यवस्था के लिए नुकसानदेह है।
सिविल सेवकों के बीच यह पक्की धारणा है कि अगर आप ईमानदार हैं, तो कोई आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। दुर्भाग्य से यह मामला इस भरोसे को ध्वस्त करता है। कई सिविल सेवक जब अखिल भारतीय सिविल सेवाओं में शामिल होते हैं, तो उनके पास एक मजबूत मूल्य व्यवस्था होती है। प्रशिक्षण की राष्ट्रीय अकादमी उन्हें सिखाती है कि अगर आप ईमानदार हैं, तो बिना किसी बदनामी के आप किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। जिलों में प्रशिक्षण के दौरान ये मूल्य और मजबूत होते हैं। मगर यह सिद्धांत आज खतरे में है। इसमें अगर सुधार नहीं हुआ, तो भ्रष्टाचार मुक्त शासन की हमारी खोज का अंत साफ दिखता है।
सभी राष्ट्रों में फैसले लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए समिति प्रणाली का गठन किया जाता है। हमारे देश में शासन की प्रणाली मजबूती से इसी शासन-प्रणाली के इर्द-गिर्द घूमती है। कोल ब्लॉक की सिफारिशों में भी इसका पालन किया गया। इन मामलों में समिति की सिफारिश एकमत से की गई। समिति के विचार-विमर्श के बाद भी किसी मंत्रालय ने सवाल नहीं उठाए। ऐसे सभी फैसलों में सभी हितधारकों की भलाई के विश्वास की धारणा निहित थी। विभिन्न मंत्रालयों द्वारा दिए गए तथ्यों की जांच उनके अधिकारियों ने की, अध्यक्ष ने नहीं। ऐसे अंतर-मंत्रालयी विचार-विमर्श में अधिकारियों द्वारा दिए गए तथ्यों की कोई भी नए सिरे से तब तक जांच नहीं करता, जब तक कि कोई स्पष्ट त्रुटि सामने नहीं आती। ऐसे सभी मामलों में समिति का अध्यक्ष आम सहमति का आकलन करता है, जो समिति का फैसला होता है। यह अध्यक्ष का नहीं, समिति का फैसला होता है। जब इन सभी मामलों में सिफारिशें सर्वसम्मति से की गई, तो कोयला सचिव को, जो समिति का अध्यक्ष था, अपराध के लिए आरोपित करना समझ से परे है।
इस मामले में प्रशासनिक गलती और अपराध के बीच अंतर करने की जरूरत भी नहीं समझी गई। भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d)(iii) के तहत इस मामले को दर्ज किया गया। इस प्रावधान के तहत किसी लोकसेवक द्वारा किसी व्यक्ति को वित्तीय लाभ देना दंडनीय है, अगर यह यह लोकहित में न हो। कानून के अनुसार, एक आपराधिक कार्रवाई के लिए आपराधिक मनोदशा या दुर्भावनापूर्ण कृत्य एक अनिवार्य तत्व के रूप में जरूरी है। इस तरह अच्छे विश्वास में किए गए कार्य को संरक्षित नहीं किया जा रहा है।
आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी निवेश में काफी वृद्धि हुई और आर्थिक विकास के लिए कई लाइसेंसों एवं प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों को किया गया। इस तरह हम हमेशा निजी क्षेत्र के किसी न किसी खिलाड़ी को लाभान्वित करते रहे। एक समिति अगर लोकहित में कुछ फैसले ले सकती है, तो दूसरी उस पर सवाल उठा सकती है। ये फैसले विभिन्न कानूनों के तहत लिए जाते हैं और अक्सर राज्य सरकार की सलाह ली जाती है। यह संभव नहीं कि इन मामलों में कोई गलती न हो या लोकहित की धारणा में अंतर न हो। ऐसा गलत तथ्य प्रस्तुत करने या गलत फैसला लेने के कारण भी हो सकता है। ऐसे सभी मामलों में गलत फैसलों को रद्द करने और नए सिरे से आवंटन करने की जरूरत है। पर जब तक अधिकारियों द्वारा दुर्भावनापूर्ण फैसले लेने और लाभ कमाने के स्पष्ट सबूत नहीं मिल जाते, तब तक निष्कपट गलती के लिए उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता। मूल बात यह है कि दुर्भावनापूर्ण तरीके से काम करने वाले व्यक्ति को पहचानिए और उसके खिलाफ मामला दर्ज कीजिए। पर अगर मौजूदा ढंग से काम चलेगा, तो फैसले लेने में गतिरोध पैदा होगा।
पिछली सरकार ने गलत फैसलों में हुई गलती को सुधारने के लिए उन्हें रद्द करने की नीति अपनाई थी। वर्ष 2002 में जिला चयन बोर्ड की सिफारिश पर बहुत सारे पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी का आवंटन किया गया था। जैसे ही पता चला कि इनमें कुछ अनियमितताएं हुई हैं, सरकार ने सभी आवंटन रद्द कर दिए। बाद में एक स्वतंत्र समिति द्वारा समीक्षा करने पर पाया गया कि करीब 75 फीसदी आवंटन नियम के खिलाफ थे। आखिरकार 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने 159 आवंटनों को रद्द करने का आदेश दिया, पर गलत सिफारिश करने के लिए किसी को जेल नहीं भेजा गया।
यह मामला सेवानिवृत्त ईमानदार सिविल सेवक के गंभीर उत्पीड़न के पहलू पर भी प्रकाश डालता है। संभवतः इसी कारण एच सी गुप्ता ऐसा चरम कदम उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। कोल ब्लॉक पर फैसला तीन बैठकों में लिया गया। समिति की बैठकों की व्यक्तिगत सिफारिशों के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि प्रत्येक मामले के लिए काफी भागदौड़ करनी होगी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने संभवतः निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए उच्च न्यायालय में अपील पर रोक लगा दी है। इस प्रक्रिया में कोयला सचिव के हाई कोर्ट में अपील करने के बुनियादी सांविधानिक अधिकार पर रोक लग गई है। यह देखते हुए, कि शीर्ष अदालत में उनका पहुंचना मुश्किल है और उसके लिए अलग से वकील करने होंगे, जिसकी फीस देने में वह अक्षम हैं, इस फैसले की समीक्षा करने की जरूरत है।
सरकार ने तेजी से फैसला लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए ईमानदार सिविल सेवकों की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है। यदि एचसी गुप्ता की रक्षा करने में सरकार इस नीति को प्रदर्शित करती है, तो सरकार की प्रतिबद्धता पर सिविल सेवकों का भरोसा मजबूत होगा। यह देश के आर्थिक विकास के लिए भी अच्छा होगा।
-लेखक पूर्व कैबिनेट सचिव हैं