हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो बताते हैं कि मानवीयता को हमेशा सर्वोपरि रखना चाहिए। अगर मन में छल-प्रपंच है और परनिंदा में समय बिता रहे हैं, तो आप वास्तव में मनुष्य नहीं हैं। छल-प्रपंच और कटुता जैसे भाव से हमेशा दूर रहना ही मानवीयता का सर्वोत्तम लक्षण है।
एक राजा विद्वानों से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान कर रहे थे। उन्होंने प्रश्न किया कि सबसे तेज काटने वाला कौन होता है। एक विद्वान ने कहा, ततैया, दूसरे ने कहा, मधुमक्खी और तीसरे ने कहा, बिच्छु। चौथे ने कहा, राजन, सांप का काटा तो पानी भी नहीं मांगता।
इन जवाबों को सुनकर भी राजा का समाधान नहीं हो पाया। उन्होंने सिंहासन पर विराजमान राजगुरु से कहा, महाराज, इसका उत्तर आप ही दीजिए।
राजपुरोहित ने कहा, राजन, मेरी दृष्टि में सबसे ज्यादा जहरीले दो होते हैं। एक निंदक और दूसरा चाटुकार। अपनी बात स्पष्ट करते हुए उन्होंने आगे कहा, निंदक के हृदय में निंदा-द्वेष रूपी जहर भरा रहता है। वह निंदा करके पीछे से ऐसे काटता है कि आदमी तिलमिला उठता है।
चाटुकार अपनी वाणी में मीठा विष भरकर ऐसी चापलूसी करता है कि आदमी अपने दुर्गुणों को गुण समझकर अहंकार के नशे में चूर हो जाता है। चापलूस की वाणी विवेक को काटकर जड़मूल से नष्ट कर देती है।
राजा की जिज्ञासा का समाधान हो गया।