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पदोन्नति में तत्काल आरक्षण

Tue, 22 Jan 2013 11:45 PM IST
मूलचंद गौतम
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हमारे महापुरुषों ने कभी यह सोचा नहीं होगा कि आजादी के बाद देश में मामूली-सी बातों को लेकर बड़े-बड़े बवाल खड़े हो जाएंगे। अब रेल को ही लीजिए। भारतीय रेल को हर मामले में देश का प्रतीक माना जाता है। वैसी ही सुस्त रफ्तार, वैसी ही गंदगी, वैसा ही भ्रष्टाचार और वैसी ही असुरक्षा। गांधी जी की निगाह में तीसरे दर्जे में सफर करने वाला आदमी ही सच्चा भारतीय था। लेकिन पिछले कुछ दशकों के दौरान देश में इतना विकास हुआ कि रेल से यह दर्जा ही खत्म कर दिया गया! नौकरियों में चौथा दर्जा हालांकि अभी मौजूद है।
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रेल के आरक्षण को ही विकास का मापदंड मानें, तो शयनयान में चलने वाला आदमी खास है। उससे ऊपर सामाजिक स्तर के अनुरूप एसी की श्रेणियां हैं। फिर रेलगाड़ी का स्तर भी मेल-एक्सप्रेस-पैसेंजर से हटकर अब राजधानी-दुरंतो-शताब्दी के लेवल तक आ गया है। इसमें आरक्षण रहित रेलयात्री सबसे दयनीय है-भेड़-बकरियों की तरह दबा-ठुंसा।

उसकी स्थिति कंपार्टमेंट के बंद दरवाजे पर टंगे हुए बेबस पैसेंजर जैसी है। उसे तो शयनयानों तक में घुसने की इजाजत नहीं है-ऊपर की श्रेणियों की बात कौन कहे। ट्रेन में शान के साथ सफर करना है, तो आरक्षण का लाभ लीजिए। यही कारण है कि अब समाज के हर तबके में आरक्षण की मांग बढ़ रही है, और इसका लाभ हासिल करने के लिए सबसे पहले रेलें ही रोकी जाती हैं, क्योंकि आरक्षण यहीं से शुरू हुआ।
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कई विशेषज्ञ कहते हैं कि यह आरक्षण ही दरअसल भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। तत्काल आरक्षण ने तो इस गंगोत्री को और गंदा कर दिया है। नोट और वोट की राजनीति इससे पहले नहीं थी। अब हर आदमी सीधे पीएम, जीएम, डीआरएम और न जाने कितने-कितने एमों की सिफारिश जेब में डालकर घूमता है।

रेल के बाद तत्काल आरक्षण का लाभ पुलिस की भर्ती में है। एक साल की तनखा अफसरों के हवाले कीजिए और बदले में जिंदगी भर की घूस और रौब-रुतबा का आनंद लीजिए। ऐसे में लगता तो यही है कि भष्टाचार ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर जाने के बजाय ब्रह्म की तरह सर्वव्यापी है।

सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण के बजाय तत्काल आरक्षण लागू किया होता, तो विकास दर शत-प्रतिशत हो जाती। बहन जी का गणित इस मामले में एकदम सही है। भाई साहब भी इसे समझ गए हैं, इसलिए मलाई मार रहे हैं।
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