दिल्ली की वायु गुणवत्ता में गहरी चिंता के स्तर तक पहुंची गिरावट मुख्यतया दिल्ली की अपनी ही देन है। किसानों का इसमें योगदान मात्र आटे में नमक के बराबर है। दिल्ली में वाहनों की भारी संख्या यहां की हवाओं में जहर उगल रही है। अभी लगभग एक करोड़ 15 लाख वाहन पंजीकृत हैं। इन वाहनों से निकले धुंए में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे कण मौजूद होते हैं, जो श्वसन संबंधी समस्याओं और उनसे उत्पन्न हृदय संबंधी रोगों को पैदा करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में कुल प्रदूषण का 40 प्रतिशत अकेले वाहनों से आता है। वाहनों से उत्सर्जित सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, पेरोक्सीएसाइल नाइट्रेट, वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (वीओसी) तथा 2.5 और 10 माइक्रोमीटर के प्रदूषक कण संपूर्ण वातावरण सहित वनस्पति और जीव-जंतुओं के साथ मानव जीवन को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, दिल्ली में बड़े पैमाने पर भवन, सड़क निर्माण कार्य, इधर-उधर खोदाई तथा बुनियादी ढांचे का विकास प्रदूषण फैलाता है। दिल्ली के प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) अपने-आप में एक महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र भी है। दिल्ली और समस्त एनसीआर में स्थित फैक्टरियां दिल्ली को प्रदूषण का 'उपहार' देने वाले बड़े स्रोत हैं। इन उद्योगों से निकले धुएं, हानिकारक रसायन और कार्बन उत्सर्जन से दिल्ली कदाचित अनभिज्ञ-सी रहती है। कोयले से संचालित बिजली संयंत्र भी प्रदूषण के कुख्यात स्रोत होते हैं। दिल्ली के आसपास स्थापित थर्मल पावर प्लांट्स से उत्सर्जित धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड के तत्व मौजूद होते हैं, जो जन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। दिल्ली और एनसीआर में उद्योगों और थर्मल पावर प्लांट्स से उत्पन्न प्रदूषण की कुल प्रदूषण में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दिल्ली में कचरा जलाने की प्रवृत्ति शेष देशों जैसी ही है, जिससे हवा में विषैली गैसों का उत्सर्जन होता है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में कचरा जलाने का कुल प्रदूषण में लगभग पांच से आठ प्रतिशत योगदान है। दिल्ली में जगह जगह कूड़े के ढेर हैं, जिनके जैविक अपघटन से भी अमोनिया, मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे दिल्ली के प्रदूषण में अनुमानतः एक से दो प्रतिशत का योगदान तो होता ही होगा।
आंकड़ों के अनुसार, आसपास के राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली के प्रदूषण में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, जबकि लगभग 90 प्रतिशत प्रदूषण दिल्ली की अपनी 'उपलब्धि' है। हालांकि राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कुल पीएम 2.5 स्तरों का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा पराली से आता है, परंतु सच यह भी है कि दिल्ली की अपनी प्रदूषण समस्या ही इसे और गंभीर बना देती है।
वर्ष के शेष महीनों के बजाय इन्हीं महीनों में दिल्ली में प्रदूषण की समस्या आखिर क्यों बढ़ जाती है? इसका कारण है प्रदूषकों का 'इनवर्टेड डिस्पर्सन' अर्थात प्रदूषकों का उल्टा फैलाव, जो एक मौसम संबंधी घटना है। इसमें ठंडी हवा धरातल की ओर रहती है और गर्म हवा ऊपर की ओर। यह परत प्रदूषकों को ऊपर की दिशा में नहीं फैलने देती, जिससे वे धरातल पर ही एकत्र हो जाते हैं। सर्दियों के महीनों में दिल्ली में यह प्रभाव और अधिक होता है, क्योंकि हवा की गति धीमी होती है और तापमान कम होता है। नतीजतन वाहनों, उद्योगों और अन्य स्रोतों से उत्सर्जित प्रदूषक वातावरण में फंस जाते हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
दिल्ली शहर में जब धूप निकलती है, तो वातावरण में प्रदूषकों की रासायनिक प्रक्रियायों के फलस्वरूप फोटोकेमिकल स्मॉग पैदा होता है। स्मॉग वह धुंध है, जो शहरों के परिवेशीय वातावरण को एक विषैली चादर से ढक लेती है। यह सौर अल्ट्रावायलेट विकिरण द्वारा उत्प्रेरित नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण उत्पन्न होता है, जिससे स्मॉग के मुख्य उत्पादों के रूप में जमीनी स्तर पर ओजोन और पैन (पेरोक्सीएसाइल नाइट्रेट) का निर्माण होता है।
हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट की 2021 की रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में लगभग 80 लाख लोगों की मौत हो गई। यह कोविड-19 के कारण मरने वाले लोगों की संख्या से अधिक है। एम्स दिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है, 'हम कोविड के बारे में चिंतित हैं, लेकिन हम वायु प्रदूषण के बारे में चिंतित नहीं हैं।'
केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सीएक्यूएम अधिनियम की धारा 15, जो पराली जलाने पर जुर्माने से संबंधित है, को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि एक निर्णायक अधिकारी नियुक्त किया जाएगा और कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सभी आवश्यक कार्यवाही की जाएंगी। यानी, कुल मिलाकर पराली जलाने वाले किसानों को ही बलि का बकरा बनाने की तैयारी है। यह सही है कि पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषणकारी हैं और किसानों द्वारा ऐसा करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए तथा कानून की अवहेलना करने वालों के लिए आर्थिक दंड का प्रावधान भी होना चाहिए। लेकिन दिल्ली के प्रदूषण में 90 प्रतिशत योगदान देने वालों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हो, इस पर भी तो ठोस नीति बननी चाहिए।
दिल्ली में वाहनों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने, निर्माण कार्यों के लिए कड़े नियम बनाने, औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने, खुले में कचरा और पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने तथा कूड़े के पहाड़ों के उचित प्रबंधन से दिल्ली को गैस चैंबर बनने से बचाया जा सकता है। दिल्ली को पर्यावरण राजनीति संबंधी प्रदूषण की काली छाया से भी मुक्त करना होगा।
-प्रो. एमेरिटस, पर्यावरण विज्ञान, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय