हां!
अघोषित ही सही
किन्तु यह भी युद्ध है
हर जिस्म पर 'सैनिक' लिखा है
और वह भी क्रुद्ध है
युद्ध है - यह युद्ध है।।
है नहीं सेना मगर
हर शीश पर शिरत्राण जैसा
कुछ न कुछ पहना सभी ने
और फिर हर एक कंधे पर कवच है
जो कि है अखबार का
किन्तु आखिर है कवच।।
यह लड़ाई अंततः किसके लिए?
शत्रु आखिर कौन है?
इस प्रश्न का उत्तर
कहीं से भी नहीं आता
किन्तु आखिर युद्ध है
जो है सतत् और अनवरत्।।
शस्त्र हैं दो चार नारे
मुट्ठियां और बंद घूंसे
जो हवा में लिख रहे हैं नाम अपना।।
आपको भी है निमंत्रण
इस अघोषित युद्ध का
जीतिये या हारिये पर आईये लड़िये
और लड़कर लौटिये आराम से
क्योंकि इसमें रंच भर भी है नहीं
कोई शहादत का सनातन सिलसिला
एक दो नारे लगाकर
आप सबसे कह सकेंगे
आज ही मुझको निमंत्रण
उन्मादिनी बड़बोली पागल हवाओं से मिला।।
आ गया हूं
युद्ध पर
शत्रु आखिर कौन है-
अब तो बताओ?