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कानून की परवाह करता कौन है?

Wed, 19 Jul 2017 06:09 PM IST
शिवदान सिंह
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शिवदान सिंह
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आम आदमी महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार और सरकारी भ्रष्टाचार से सबसे अधिक क्षुब्ध होता है। लेकिन यहां तो राष्ट्रीय राजधानी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। गहराई से जांच करें, लालू यादव जैसे अनेक भ्रष्टाचारी मिल जाएंगे। कानून का भय न होने के कारण ही यह स्थ‌िति पैदा हुई है।
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सैकड़ों वर्षों की गुलामी के दुष्प्रभाव देश में जगह-जगह देखे जा सकते हैं। कानून-व्यवस्था की स्थ‌िति इन दुष्प्रभावों में से ही एक है। गुलामी के कारण राष्ट्रीय चरित्र विकसित नहीं हुआ। नतीजतन जो ताकतवर है, वह कुछ भी कर सकता है और उस पर कोई कानून लागू नहीं होता। पर सूचना के इस युग में मीडिया के प्रयासों से समाज में घटित अपराधों तथा बाहुबलियों की करनी प्रकाश में आ जाती है। इसलिए कानून-व्यवस्था की यह स्थिति ज्यादा भयावह नजर आ रही है। आम नागरिक को दो प्रकार के अपराध ज्यादा हताश करता है। पहला महिलाओं के विरुद्ध होने वाला अपराध तथा दूसरा सरकारी भ्रष्टाचार। 

कुछ दिन पहले दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने महिला अपराधों पर एक बैठक बुलाई थी। बैठक में महिला अपराधों के जो आंकड़े दिए गए, उसके मुताबिक, विगत जून के पहले पखवाड़े में दिल्ली में 136 महिलाओं का अपहरण हुआ, जिनमें से  94 के साथ दुष्कर्म की बात सामने आई। इस साल एक जनवरी से 15 जून तक दिल्ली में ही 1,690 महिलाओं के अपहरण हुए जिसमें 930 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हुई। पिछले डेढ़ साल में दिल्ली में ही तीन युवतियों को सरेआम चाकुओं से गोदकर मार डाला गया। देश की अन्य जगहों में भी महिलाओं के विरुद्ध अपराध कम नहीं हुए हैं।
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जहां तक भ्रष्टाचार की बात है, लालू यादव परिवार के भ्रष्टाचार की चर्चा चारों तरफ है। प्राथमिक जांच में सबूत मिलने के बाद सीबीआई ने लालू के बेटे तेजस्वी यादव के ‌खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है, पर तेजस्वी उप-मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने पर अड़े हैं। यदि राजनेताओं तथा नौकरशाहों की संपत्तियों की जांच कराई जाए, तो लालू यादव जैसे अनेक नाम सामने आ सकते हैं। जिसे जहां भी मौका मिल रहा है, वह भ्रष्टाचार करने से नहीं चूक रहा। राष्ट्रीय चरित्र विकसित न होने का यह एक और उदाहरण है।

देश की मौजूदा स्थ‌ि‌ति के लिए जहां गिरते नैतिक मूल्य तथा भौतिकवाद को जिम्मेदार ठहराया जाता है, वहीं समाज का आदर्श कहलाने वाले राजनेताओं तथा नौकरशाहों की करनी भी इस सबके लिए बहुत हद तक दोषी है। देश की कानून-व्यवस्था तथा 1861 के ऐक्ट द्वारा चलने वाली पुलिस प्रणाली  भी उतनी ही जिम्मेदार है। इसी कारण शक्तिशाली राजनेताओं एवं नौकरशाहों को अपने जुर्मों की या तो सजा मिलती ही नहीं और यदि पांच प्रतिशत मामलों में मीडिया के शोर-शराबे के बाद कुछ होता भी है, तो उसमें लंबा समय लग जाता है। शशिकला और शाहबुद्दीन के उदाहरण बताते हैं कि जेल में भी ये आराम से ही रहते हैं।

टेरी के पूर्व अध्यक्ष आरके पचौरी तथा एक पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर अपनी महिला सहयोगियों के साथ अभद्रता करने के आरोप हैं, पर इनके विरुद्ध मुकदमें अभी प्रारंभिक स्तर पर ही हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिए एक महिला को सर्वोच्च अदालत तक जाना पड़ा।

अक्सर सत्ता से बेदखल हुए नेताओं के विरुद्ध घोटालों को मीडिया में उछाला जाता है, दिखावे के लिए जांच भी की जाती है, पर इनमें सजाएं न के बराबर होती हैं।  सत्ता में बैठे लोग इनको सजा नहीं देना चाहते, ताकि वोट बैंक बदले की राजनीति के नाम पर नाराज न हो जाए। सत्ताधारियों के इस व्यवहार से आम नागरिक कानून-व्यवस्था में विश्वास खो बैठता हैं। देश को अपराधमुक्त करना है, तो ऐसा माहौल बनाना होगा, जिससे कानून का भय सबमें हो।
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