तीस साल पहले एक बार मैंने कहा था कि रवींद्रनाथ मुझे ईश्वर की तरह लगते हैं। ईश्वर तो वही है, जिसके ज्ञान और गुण की सीमा न हो। रवींद्रनाथ के गीतों में लंबे समय तक डूबे रहने पर ऐसा ही एहसास होता है। लेकिन शुक्र है कि तीन दशक पहले रवींद्रनाथ को ईश्वर कहने के कारण कोई तांडव नहीं मचा। किसी ने मुझ पर उंगली नहीं उठाई। किसी ने मेरा सिर कलम करने का फतवा जारी नहीं किया। मेरी बेहद सुंदरी खाला को दुर्गा कहने पर (बंगाल में तीखे नैन-नक्श वाली महिलाओं की सुंदरता की तुलना देवी दुर्गा से करने का प्रचलन है) कोई मेरे ऊपर चिल्लाया नहीं कि तुमने देवी का अपमान किया है। मेरे भतीजे को न बाल छोटे करवाने में विश्वास है, न शेविंग करने में। उसके लंबे-लंबे बाल और दाढ़ी देखकर मैं अक्सर मजाक में कहती हूं कि तू तो एकदम ईसा मसीह की तरह लगता है। लेकिन इससे किसी का अपमान नहीं हुआ, किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंची।
अपने पिता के बारे में तो मैं हमेशा ही कहती हूं कि वह भगवान हैं। इसकी वजह भी है। पूरी जिंदगी उन्होंने केवल दूसरों की ही चिंता की, दूसरों की भलाई करने के बारे में सोचा। अपने बारे में सोचने का तो उन्हें समय ही नहीं मिल पाया। लेकिन इसके बजाय अगर मैं यह कहूं कि मेरे अब्बा मेरे अल्लाह हैं, तो आफत आ जाएगी। कट्टरवादी मुझ पर टूट पड़ेंगे। मुझ पर ईशनिंदा करने का आरोप लगेगा, जिसकी कहीं कोई माफी नहीं है। मरने के बाद तो मैं दोजख में जाऊंगी ही, उससे पहले इस जन्म में मेरा सिर कलम करने का फतवा भी जारी हो जाएगा।
कोलकाता के कॉमेडियन मीर अफसर अली ने ईद के दिन अपने पिता के साथ सेल्फी खींची और 'मेरे अब्बा-मेरे अल्लाह' लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। नतीजा वही हुआ, जो होना था। इसको लेकर भारी हंगामा मच गया। मीर अफसर अली अब मुस्लिम कट्टरवादियों के निशाने पर हैं। मीर अगर 'मेरे अब्बा मेरे ईश्वर' लिखते, तो शायद इतनी आफत नहीं आती। तब संभवतः कोई मीर की पिटाई करने के लिए भी आगे नहीं आता। मीर के लिए ईश्वर और अल्लाह एक हो सकते हैं, लेकिन सब ऐसा नहीं सोचते। कम से कम कट्टरवादी तो नहीं ही।
अल्लाह शब्द का उच्चारण हर कोई श्रद्धा के साथ करता हो, ऐसा भी नहीं है। वर्ष 2001 में अमेरिका पर आतंकवादी हमले के बाद तो और भी नहीं। ईसाई, यहूदी, कट्टरवादी हिंदू और मुस्लिम-विरोधी अल्लाह को गालियां देते हैं। जेहादी आतंकवादी 'अल्लाहू-अकबर' कहते हुए दाव से (हंसिये के जैसा एक मजबूत और धारदार हथियार) निरीह और असहाय मनुष्यों की हत्या कर डालते हैं। आजकल तो कहीं अल्लाहू-अकबर सुनने पर ही डरे-सहमे लोग उल्टे पांव भागते हैं।
ध्यान रखने की बात है कि मीर ने अल्लाह शब्द का उच्चारण किसी की निंदा-आलोचना या हत्या करने के लिए नहीं किया। मीर ने अपने पिता के प्रति प्रेम और श्रद्धा के कारण उन्हें अल्लाह कहा। मीर को अपराधी मानने का अर्थ होगा, प्रेम और श्रद्धा को अपराध मानना। एक सरल हृदय व्यक्ति अपनी सहज उक्ति के लिए कट्टरवादियों के निशाने पर आ गए हैं।
मौलवियों का कहना है कि अल्लाह से अपने पिता की तुलना कर मीर ने ईशनिंदा का अपराध किया है! किंतु ईशनिंदा तो हम प्रतिदिन कर रहे हैं। हम जब किसी के सामने सिर झुकाते हैं, तो वह अल्लाह का अपमान ही तो हुआ, क्योंकि इस्लाम में अल्लाह को छोड़कर और किसी के सामने सिर न झुकाने की बात कही गई है। लेकिन सिर झुकाना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। अपने गुरुजनों के प्रति हम इसी तरह अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं। बहुत प्राचीन काल से बंगाल में बंगाली इसी परंपरा का पालन कर रहे हैं। और सिर्फ बंगाली ही क्यों, हिंदू परंपरा में श्रद्धा व्यक्त करने का यही तरीका है। एक दौर में बंगाल में हिंदुओं के एक हिस्से ने मुस्लिम धर्म ग्रहण किया था। लेकिन धर्म बदलने से ही तो संस्कृति नहीं बदल जाती। हमारी वेश-भूषा, रीति-रिवाज, खान-पान-सब मूलतः बंगाल का ही है, इस्लाम की मूल जन्मभूमि का नहीं। अरब के लोग जिसे ईशनिंदा कहते हैं, बंगाल की मिट्टी में हम उसे ईशनिंदा नहीं कहते। बंगाली मुसलमानों का रहन-सहन देख शायद अरब के मुसलमान कहें कि हम मुसलमान हैं ही नहीं। बंगाल का मुसलमान इसी तरह नाइजीरिया के मुस्लिमों को देख संभवतः हैरत में पड़ जाए कि वे मुसलमान हैं भी या नहीं। इससे भला किसी का क्या आता-जाता है! मैं मानती हूं कि धर्म का पालन अपने हिसाब से ही करना चाहिए। यह नितांत व्यक्तिगत मामला है। इसमें किसी का हस्तक्षेप क्यों हो? कौन अल्लाह से ज्यादा जुड़ा हुआ है, कौन अल्लाह की परवाह ही नहीं करता, कौन किस पद्धति से अल्लाह की इबादत करता है, इस बारे में हंगामा या खून-खराबा न करने से ही शायद समाज में शांति रह सकती है। लेकिन मुश्किल मुस्लिमों में व्याप्त इस धारणा को लेकर है कि वे विधर्मियों का धर्मांतरण करने पर जीवन के आखिर में पुरस्कृत होंगे। दूसरे रास्ते पर चलने वालों को वे अल्लाह के रास्ते पर ले आएंगे, तो इससे उनके नेकी कमाने का रास्ता खुलेगा। पुरस्कार के लालच में, नेकी कमाने के लालच में धर्मांध लोग धर्मांतरण की कोशिशों मे लगे हैं। क्या इस तरह कोई धर्म जिंदा रह सकता है?
मानवाधिकार को पददलित कर, सभ्यता को अंगूठा दिखाकर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म कर जो धर्म जिंदा रहता है, वह जेहादियों, अशिक्षितों, मूर्खों और कट्टरवादियों के हाथों में चला जाता है। ऐसे में प्रगतिशील और स्वतंत्र विचार के लोग धीरे-धीरे या तो मारे जाते हैं या निर्वासित हो जाते हैं। पहले भी कहती आई हूं, आज भी कह रही हूं कि सभ्य दुनिया का हिस्सा बने रहने के लिए मानववादी बने बिना इस्लाम के सामने और कोई विकल्प नहीं है।