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मायावती के फैसले से किसे फायदा

अजय बोस
Updated Sun, 07 Oct 2018 07:30 PM IST
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मायावती

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने के बसपा सुप्रीमो मायावती के फैसले से मोदी-विरोधी खेमे में खलबली मच गई है, जिसे इन तीन राज्यों और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने की संभावनाओं के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। इसके विपरीत भाजपा के प्रवक्ता और उसके समर्थक 2019 के चुनाव से पहले ही विपक्षी दलों के बीच संभावित महागठबंधन के ध्वस्त होने से काफी हद तक उत्साहित हैं। जबकि इस बात को मानने के अच्छे कारण हैं कि आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के लिए बसपा-कांग्रेस गठबंधन न केवल जमीनी स्तर पर अस्थिर था, बल्कि नतीजे निर्धारित करने और अगले वर्ष की बड़ी चुनावी परीक्षा के लिहाज से भी उसका महत्व मामूली था।



वास्तव में हैरानी की बात यह है कि अनेक राजनीतिक पंडितों ने बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन को आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के लिए खेल बदलने वाला मान लिया, जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बसपा के जनाधार में पिछले कुछ चुनावों के दौरान भारी गिरावट आई है।


चुनावी आंकड़ों पर एक नजर डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि जिन सीटों पर बसपा चुनाव लड़ी, वहां उसके वोट प्रतिशत में बुरी तरह से गिरावट देखी गई। मध्य प्रदेश में पार्टी को 2003 में 10.61 फीसदी मत मिले थे, जो  2008 में  9.08 फीसदी रह गए और 2013 में और घटकर 6.42 फीसदी पर पहुंच गए। छत्तीसगढ़ में उसे 2003 में 6.94 फीसदी, 2008 में 6.12 फीसदी और 2013 में 4.29 फीसदी वोट मिले, जबकि राजस्थान में उसे 2003 में 6.40 फीसदी, 2008 में 7.60 फीसदी और 2013 में मात्र 3.48 फीसदी वोट ही मिले।

 

चुनाव आयोग के आंकड़े ये भी दर्शाते हैं कि इन तीन राज्यों में बसपा की घटती मौजूदगी भी कुछ सीमित निर्वाचन क्षेत्रों तक ही सिमटी है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में 228 में 182 सीटों पर बसपा की जमानत जब्त हो गई थी, जबकि 2013 में 227 में से 194 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी।


छत्तीसगढ़ के उसके चुनावी आंकड़े तो और भी खराब हैं। 2008 में छत्तीसगढ़ में उसके 90 प्रत्याशियों में से मात्र सात उम्मीदवारों की जमानत बची, और 2013 में यह आंकड़ा घटकर छह पर आ गया। 

एक मिथक यह भी है कि इन तीनों राज्यों में दलित वोट पर बसपा की मजबूत पकड़ है। इसे भी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद सेंटर फॉर स्टडीज ऑफ द डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के जाति एवं समुदाय आधारित चुनाव बाद सर्वेक्षण ने खारिज कर दिया है। मध्य प्रदेश में बसपा (22. 4 फीसदी) के मुकाबले कांग्रेस (33.1) और भाजपा (35.8) को अनुसूचित जाति का ज्यादा समर्थन मिला।


छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बसपा को और भी कम समर्थन प्राप्त है। छत्तीसगढ़ में मात्र 11.5 दलितों ने कहा कि उन्होंने बसपा को वोट दिया है, जबकि 48.7 फीसदी ने कांग्रेस को वोट देने की बात कही। राजस्थान में मात्र 19.5 फीसदी जाटवों (जो मायावती के कट्टर समर्थकों में शामिल हैं) ने बसपा को अपनी पसंद बताया, जबकि अन्य अनुसूचित जातियों में से किसी ने भी नहीं। वहीं कांग्रेस को 46 फीसदी जाटवों और 44 फीसदी अन्य अनुसूचित जातियों ने समर्थन की बात कही।
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सोनिया गांधी और मायावती के बीच बहुप्रचारित सौजन्यता के बावजूद इन तीन राज्यों में जमीनी स्तर पर चुनावी हकीकत ने अंततः गठबंधन को असंभव बना दिया। दलित नेता के करीबी सूत्रों ने महसूस किया कि मायावती को इस बात पर संदेह था कि कांग्रेस के वोट बसपा में जा पाएंगे, हालांकि उन्होंने अपनी पार्टी के लिए सीटों की मांग घटा दी थी। असल में यह वही कारण है, जिसे उन्होंने पिछले कुछ दशकों में दोहराया है कि कांग्रेस के साथ चुनाव से पहले गठबंधन उनकी पार्टी के हित के खिलाफ काम करेगा।

 

इन तीनों राज्यों के कांग्रेसी नेता निजी तौर पर मायावती के संदेहों की पुष्टि करते हैं। वे मानते हैं कि इस बात की संभावना नहीं थी कि उनके मतदाता बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करेंगे, और हो सकता था कि वे मतदाता उन निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में मुड़ जाते, जिससे भाजपा को बढ़त मिल जाती। जैसा कि सीएसडीएस के 2013 के चुनाव बाद हुए सर्वे बताते हैं कि दलितों के बीच भी बसपा का जनाधार कांग्रेस के मुकाबले काफी कम है और बसपा उम्मीदवारों को कोई बड़ी रियायत देने पर उनके अपने दलित नेता की ओर से प्रतिरोध की आवाज उठ सकती थी।

 

कांग्रेस के करीबी सूत्रों ने यह भी संकेत दिया कि चूंकि एससी-एसटी ऐक्ट के कारण भाजपा से नाराज सवर्ण हिंदू मतदाताओं का वोट मिलने की भी पार्टी को उम्मीद है, ऐसे में, बसपा के साथ औपचारिक गठबंधन आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए हानिकारक हो सकता है। यह तेजी से स्पष्ट हो रहा है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव के नतीजे को निर्धारित करने वाला असली कारक यह है कि भाजपा शासित इन राज्यों में सत्ता-विरोधी रुझान कितना प्रबल है, जहां कांग्रेस इसका लाभ उठाने वाली अकेली पार्टी मानी जाती है।

 

 इन राज्यों में विपक्षी एकता के नाम पर घटते जनाधार वाली बसपा के साथ बेकार का गठबंधन अंततः भाजपा को ही फायदा पहुंचा सकता था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए जमीनी हकीकत से जुड़े बगैर इंद्रधनुषी गठबंधन बनाने के बजाय उत्तर प्रदेश में उभरते यादव-जाटव-जाट-मुस्लिम गठबंधन या बिहार में राजद द्वारा इसी तरह के गठजोड़ के साथ आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का संभावित पुरुत्थान मोदी के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है।

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