महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के जिस समुद्र तटीय गांव में मैं पंद्रह वर्ष पहले रहने आई थी, तब यहां सभी खुले में शौच किया करते थे। सुबह जब समंदर किनारे मैं घूमने निकलती थी, तो पानी की तरफ आंखें टिकाकर रखती थी, क्योंकि दूसरी तरफ एक कतार में महिलाएं खुले में शौच करती बैठी होती थीं। वैसे समंदर की तरफ भी देखना आसान नहीं था, क्योंकि इस तरफ गांव के पुरुष बैठा करते थे। इस गांव में मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों से पर्यटक इतने आते हैं कि हर दूसरा घर अब छोटा होटल बन गया है, सो गांव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर हो गई है। पर्यटक ही थे, जो खुले में शौच करने वाले इन लोगों को देख कर हंसते या इनको शर्मिंदा करने की कोशिश करते थे। गांववालों के लिए सुबह का यह दृश्य बिल्कुल आम था।
स्वच्छ भारत अभियान का इतना प्रभाव हुआ है कि आज इस गांव में खुले में शौच करने की प्रथा बंद हो गई है। ऐसा हुआ है, क्योंकि स्वच्छ भारत अभियान में शौचालय बनाने के लिए सरकारी सहायता मिलने का प्रावधान है। पिछले चार वर्षों में गांव का हाल इतना बदल गया है कि हर घर में निजी शौचालय बन गया है। सो जब मेरे दोस्त परमेश्वरन अय्यर ने मुझे महात्मा गांधी इंटरनेशनल सेनिटेशन कॉन्फ्रेंस में आने के लिए दिल्ली आमंत्रित किया, तो मैंने तय किया कि मैं जरूर आऊंगी। परमेश्वरन अय्यर केंद्र सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में मुख्य सचिव हैं। देश में स्वच्छता लाना उनके लिए धर्म समान है, सो नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से घोषणा करके जब अपना स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था, तब वह विश्व बैंक की अपनी नौकरी छोड़कर यह काम करने आए थे।
इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में विदेशों से बड़े-बड़े विशेषज्ञ आए थे और कम से कम नब्बे देशों ने अपने प्रतिनिधि भेजे थे। केंद्र सरकार ने इनको गर्व से बताया कि चार वर्ष पहले जहां खुले में शौच करने वाले भारतीय साठ फीसदी थे, वहीं आज यह आंकड़ा बीस प्रतिशत के करीब ही है। यह भी उनको बताया गया कि कई राज्य और अनेक शहर खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं। इस कॉन्फ्रेंस में मेरी बातचीत कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से हुई, जिन्होंने स्वीकार किया कि भारत में स्वच्छता को लेकर जिस तेजी से परिवर्तन आया है, उतनी तेजी से कभी किसी दूसरे देश में नहीं आया होगा।
स्वच्छ भारत अभियान इतना सफल रहा है कि यह कहना गलत न होगा कि इसको जन आंदोलन में तब्दील करना मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। लेकिन जब मैंने इस पर एक ट्वीट किया, तो मुझ पर विरोधी ट्वीटों का पहाड़ टूट पड़ा, तुम भक्तन हो, मोदी की चमचागीरी करना बंद करो, तुम्हारी राज्यसभा की सीट तय है, इत्यादि। माना कि मोदी के आलोचकों की कमी नहीं है और उनको पूरा अधिकार है अपनी बात कहने का, लेकिन जब देश के लिए कुछ अच्छा होता है, तो क्या उसको स्वीकार करने में इतनी कठिनाई होनी चाहिए?
मुझे अफसोस इस बात का भी हुआ कि इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस को न तो मीडिया में वह अहमियत दी गई, जो मिलनी चाहिए थी और न ही इस कॉन्फ्रेंस में वे जाने-माने टीवी ऐंकर और पत्रकार दिखे, जो ऐसे सम्मेलनों में अक्सर दिखते हैं। ऐसा शायद इसलिए हुआ, क्योंकि हम पत्रकार मानते हैं कि अच्छी खबर को खबर ही नहीं माना जाना चाहिए। क्या उस समय भी नहीं, जब देश में कोई इतनी बड़ी चीज हुई हो, जिससे भविष्य में हमारे बच्चों की जानें बच सकेंगी?