देश के पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में आगामी फरवरी और मार्च में चुनाव होने वाले हैं। तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता के बीच एक बात जो निश्चित तौर पर कही जा सकती है, वह यह कि सभी राजनीतिक पार्टियां गरीबों की शुभचिंतक होने का दावा करती हैं और हर पार्टी विकास का वायदा करती है। इसके साथ ही सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख कहते हैं कि वे अकेले ही विकास की शुरुआत कर सकते हैं।
संभावित विकास को लेकर कौन आपत्ति कर सकता है? लेकिन मजे की बात यह है कि यहां विकास का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग है। यानी सौंदर्य की तरह विकास देखने वालों की आंखों पर निर्भर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'विकास' के आह्वान के साथ भाजपा के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करना चाहते हैं। चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में हाल ही में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा, 'हमारे पास लोगों के जीवन में बदलाव लाने, भ्रष्टाचार खत्म करने और विकास का लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है।' लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि प्रधानमंत्री विकास का कौन-सा मॉडल प्रस्तावित कर रहे हैं। क्या यह गुजरात का मॉडल है, मध्य प्रदेश का मॉडल है, राजस्थान का मॉडल है या हरियाणा का मॉडल है? ये सभी भाजपा शासित राज्य हैं, लेकिन उनका रिकॉर्ड न तो एक समान है और न ही ये विकास के सार्वभौमिक पैमानों को पूरा करते हैं।
यदि हम विकास का मतलब इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, मसलन, सड़क, पुल आदि और व्यवसाय करने में आसानी समझें, तो भाजपा शासित कई राज्यों के पास दिखाने के लिए कुछ न कुछ है। लेकिन अगर हम विकास को सामाजिक पैमानों-स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता आदि-के आईने में देखें, तो एक अलग तरह की तस्वीर उभरती है।
उदाहरण के लिए, सिर्फ एक सूचकांक शिक्षा को लेते हैं। चुनाव में जाने वाले सभी राज्यों और संपूर्ण भारत में शिक्षा की स्थिति नाजुक है। इसका कारण साधारण है। हम मुख्य रूप से एक युवा राष्ट्र हैं, जनसांख्यिकीय लाभांश को तभी पूरी तरह से महसूस किया जा सकता है, जब हमारे युवा शिक्षित और हुनरमंद हों तथा तेजी से कठिन और प्रतिस्पर्धी होती दुनिया में अपनी जगह बनाने में सक्षम हों।
वास्तविकता हालांकि निराशाजनक है-शिक्षा के क्षेत्र में भयानक संकट है, जो चार बीमारू राज्यों-बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्पष्ट परिलक्षित होता है। इनमें से दो राज्यों में भाजपा की सरकार है और दो में विपक्षी दलों की सरकार है। इन चारों राज्यों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी से नीचे है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार की साक्षरता दर 61.8 फीसदी, राजस्थान की 67.1 फीसदी, उत्तर प्रदेश की 67.7 फीसदी और मध्य प्रदेश की 70.6 फीसदी है।
यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि अगर आप विकास चाहते हैं, तो पहला जरूरी कदम है महिलाओं को शिक्षित करना। तो देश के विभिन्न राज्यों में महिला साक्षरता की दशा क्या है? एक बार फिर यह स्पष्ट होता है कि जो राज्य अन्य पैमानों पर बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जरूरी नहीं कि महिला साक्षरता के मामले में भी उनका प्रदर्शन बेहतर हो। जब हम विकास की बात कर रहे हैं, तो महिला साक्षरता को एक मुख्य संकेतक के रूप में उपयोग करते हुए दो मॉडलों-केरल और तमिलनाडु को देखना होगा। दोनों राज्यों में महिला साक्षरता दर ऊंची है और वहां सर्वाधिक महिला उद्यमी हैं। इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वाधिक शिक्षित महिलाओं वाले पांच राज्यों-तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र-में देश के 53 फीसदी ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान हैं, जिसकी मालकिन महिलाएं हैं। इन राज्यों में से सिर्फ महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है। यकीनन, कम महिला साक्षरता वाले राज्य रातोंरात स्थिति को नहीं बदल सकते। सवाल है कि यह उनकी प्राथमिकता में कितना है।
व्यवसाय करने में आसानी से संबंधित रैंकिंग की बात करें, तो केंद्र सरकार के औद्योगिक नीति एवं प्रोत्साहन विभाग द्वारा हाल ही में किए गए एक अखिल भारतीय अध्ययन में मध्य प्रदेश को देश के शीर्ष पांच राज्यों में दर्शाया गया, यहां भी भाजपा की सरकार है। लेकिन महिला साक्षरता और बालिकाओं की शिक्षा के मामले में मध्य प्रदेश का रिकॉर्ड प्रभावी नहीं है। इस राज्य में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च कक्षाओं में स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर सर्वाधिक 26 फीसदी है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर, 2015 तक उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 10 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 19 फीसदी, महाराष्ट्र में 12 फीसदी और राजस्थान में 13 फीसदी है।
जिस देश में युवाओं की आबादी सर्वाधिक हो और जो आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखता हो, वहां विकास मायने रखता है। जाहिर है, बुनियादी ढांचे और कारोबार करने में आसानी के बगैर आर्थिक प्रगति या विकास नहीं हो सकता। यह भी स्पष्ट है कि पुरुष और महिलाओं की शिक्षा और कौशल के बिना समान विकास या वास्तविक विकास नहीं हो सकता।
तो फिर मतदाताओं के पास क्या उपाय बचता है? जब राजनेता उनसे विकास का वायदा करें, तो मतदाताओं को उनसे पूछना चाहिए कि विकास से उनका क्या मतलब है और वे किस तरह विकास करेंगे। पिछले दो महीने से एक सवाल मुझे परेशान किए हुए है कि यदि चुनाव से पहले 'नकदविहीन भारत' की लड़ाई छेड़ी जा सकती है, तो 'सौ फीसदी साक्षर भारत' के लिए क्यों नहीं! ज्यादातर विकसित देशों ने-जिसने कम नकदी का रास्ता चुना, वर्षों पहले सार्वभौमिक साक्षरता हासिल कर ली है।