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किस ओर जाएगा मालदीव

आनंद कुमार Updated Fri, 21 Sep 2018 06:48 PM IST
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अब्दुल्ला यमीन

मालदीव में कल राष्ट्रपति के चुनाव होने वाले हैं, लेकिन वहां लोकतंत्र ही अपने अस्तित्व के संघर्ष कर रहा है। हालांकि मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन ने संयुक्त विपक्ष को अपना उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह (इबु) को खड़ा करने की इजाजत दे दी है, लेकिन यह डर है कि चुनाव में धांधली हो सकती है। वर्ष 2013 के विवादास्पद चुनाव में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से ही यमीन तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने शासन के जरिये सभी विपक्षी दलों को दबाने की कोशिश की और ऐसी विवादास्पद नीतियां शुरू की हैं, जिनसे मालदीव की संप्रभुता के साथ समझौता हो सकता है।



2013 में सत्ता संभालने के तुरंत बाद यमीन ने सभी विपक्षी दलों का सफाया कर अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए काम शुरू कर दिया। उन्होंने न केवल फर्जी आतंकवाद के आरोप पर मालदीवियन डेमोक्रैटिक पार्टी (एमडीपी) के नेता मोहम्मद नाशीद को कैद किया, बल्कि अपने सहयोगी दल जम्हूरी पार्टी के नेता गासिम इब्राहिम के भी वह पीछे पड़ गए। उन्होंने जम्हूरी पार्टी को संसद में स्पीकर का पद देने के चुनाव पूर्व आश्वासन से भी इन्कार कर दिया। इसके अलावा उन्होंने एक ऐसा कानून बनाया, जो 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने से रोकता है। राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए यमीन ने अपनी इस्लामी पहचान बनाने की कोशिश की है, ताकि कट्टरपंथी तबके का वोट हासिल कर सकें। यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी निष्ठा सिर्फ सत्ता में है।

 

यमीन ने चीन के साथ कई विवादास्पद सौदे किए। इन परियोजनाओं की लागत जरूरत से ज्यादा है। जैसे, वेलेना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की अनुमानित लागत करीब 65 करोड़ डॉलर है, लेकिन यमीन सरकार इसके लिए 1.2 अरब डॉलर देने को तैयार है। यमीन का कहना है कि लागत बढ़ गई है, क्योंकि परियोजनाएं तेजी से पूरी हो रही हैं। यमीन एक ऐसा कानून ले आए हैं, जो विदेशियों को मालदीव में द्वीप खरीदने की इजाजत देता है। यह कानून वास्तव में चीन को मालदीव में जमीन खरीदने की सुविधा देने के लिए लाया गया है। कई खबरों से संकेत मिलता है कि चीन मालदीव में पहले ही द्वीप खरीद चुका है। यमीन का कहना है कि उनके ये कदम देश में समृद्धि और विकास लाने वाले हैं। लेकिन उन्होंने देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा से भी समझौता किया है। यमीन यह तो कहते हैं कि वह ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा को खतरा हो, पर उनके कामकाज कुछ और ही संकेत देते हैं। वह राष्ट्रीयता का कार्ड खेल रहे हैं और जनता को बता रहे हैं कि उनकी गैरमौजूदगी में मालदीव पर विदेशी ताकतें हमला करेंगी, लेकिन चीन से अपनी नजदीकी के बारे में वह कुछ नहीं बताते।


यमीन ने मोहम्मद नाशीद, गासिम इब्राहिम, और अपने सौतेले भाई मैमून अब्दुल गयूम तक को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी है। नतीजतन विपक्ष ने इबु को अपना साझा उम्मीदवार बनाने का फैसला किया। मतदाता सूची में धांधली के आरोप लग रहे है। मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि पर विपक्ष का कहना है कि इनमें से ज्यादातर नकली हैं। मालदीव सरकार उन अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के लिए वीजा को प्रतिबंधित करने की कोशिश कर रही है, जो चुनाव निगरानी के लिए देश में आना चाहते हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने भी समझौता कर लिया है, क्योंकि उसके प्रमुख यमीन की पार्टी के पूर्व महासचिव हैं। विपक्ष के मुताबिक, आयोग ने कई नियम बदल दिए हैं, जो चुनाव में धांधली से इरादे से किए गए हैं। अब स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को पूरी मतगणना प्रक्रिया से बाहर रखा जाएगा। विपक्षी दलों या उनके प्रतिनिधियों द्वारा की गई शिकायत का निपटारा चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद किए जाएंगे। पहले हरेक मतदान केंद्र अपना नतीजा घोषित करता था, अब उन्हें अपना नतीजा केंद्रीय प्राधिकार को सौंपने के लिए कहा गया है। चुनाव आयोग के कई अधिकारी यमीन के लिए प्रचार करते देखे गए हैं। हाल ही में यूरोपीय संघ के संसदीय शिष्टमंडल ने मालदीव का दौरा किया और उन्हें बड़ी गड़बड़ियां मिलीं। उन्होंने चालीस लोगों की सूची तैयार की, जो यमीन के करीबी है। अगर मालदीव में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से नहीं होते हैं, तो उस पर प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है। अमेरिका ने भी चुनाव में धांधली के खिलाफ चेतावनी जारी की है।


पिछले चुनाव में यमीन को मात्र 25 फीसदी वोट मिले थे। उस समय उन्हें पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल गयूम का समर्थन प्राप्त था। इसके बाद वह जम्हूरी पार्टी के साथ गठजोड़ के कारण चुनाव जीत सके थे, जिसे 25 फीसदी वोट मिले थे। इस बार गयूम और गासिम इब्राहिम, दोनों उनका विरोध कर रहे हैं। ऐसे में यमीन तभी चुनाव जीत सकते हैं, जब अचानक उनके पक्ष में भारी मतदान हो। लेकिन ऐसा संभव नहीं दिखता, क्योंकि मालदीव की राजनीति में कई खिलाड़ी इस समय सक्रिय हैं। हालांकि यमीन येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना चाहेंगे और अगर वह इसमें सफल हो गए, तो मालदीव में लोकतंत्र का पतन हो जाएगा। जाहिर है कि राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे मालदीव में लोकतंत्र के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।


मालदीव में लोकतंत्र के पतन और तानाशाही यमीन की सत्ता में निरंतरता से भारत के पड़ोस और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा का वातावरण बदल जाएगा। यमीन का झुकाव निर्णायक रूप से चीन और पाकिस्तान की तरफ है, जो भारत के मित्र नहीं हैं। यमीन के राष्ट्रपति काल में मालदीव में वहाबी विचारधारा का तेजी से प्रसार हुआ है। मालदीव के लोग अपनी स्वतंत्रता पर गर्व करते हैं और वे ऐसे शासन को पसंद नहीं करेंगे, जो देश की संप्रभुता से समझौता करे। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वहां के लोगों को स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से अपने लोकतांत्रिक अधिकार के इस्तेमाल की इजाजत मिलेगी।

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