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कहां जाएंगे ये आदिवासी

ज्ञानेन्द्र रावत Published by: Raman Singh Updated Mon, 25 Feb 2019 06:21 PM IST
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ज्ञानेन्द्र रावत

देश की आबादी में आठ फीसदी हिस्सा रखने वाले आदिवासी आजादी के इतने साल बाद भी शोषित, पीड़ित और उत्पीड़ित हैं। दरअसल भारत के वन एवं वन्यजीव संरक्षण से जुड़े सरकारी कानून पश्चिम की उस अवधारणा पर आधारित हैं, जिसमें कहा गया है कि मानव और मानवेतर प्रजातियां एक साथ नहीं रह सकतीं। उसके अनुसार, जैव विविधता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब जंगल में मानवीय हस्तक्षेप न हो। इस सोच के पीछे उन बाहरी व्यावसायिक शक्तियों का भी हाथ है, जिन्होंने जंगल, जंगल में रहने वाले जीव और आदिवासियों का भरपूर शोषण-दोहन किया है। हमारी सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की खातिर बिना वनों और पर्यावरण की क्षति का सही आकलन किए जिस तेजी से विकास यज्ञ में वनों के कटान और वहां रह रहे आदिवासियों को हटाने की अनुमति दी, उसका सबसे बड़ा खामियाजा वन, वनवासी और वन्यजीवों को उठाना पड़ा। ऐसी स्थिति में जंगल, जंगली जीव और आदिवासियों-वनवासियों की रक्षा की बात कैसे की जा सकती है? यदि आदिवासी नहीं रहेंगे, तो जंगल भी नहीं बचेंगे।



आज उन्हीं वनवासियों पर जंगल से बेदखली की तलवार लटक रही है। बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी आदेश के तहत जंगलों में रहने वाले करीब 11 लाख आदिवासी-वनवासी परिवारों को निकालने के लिए कहा गया है, जिनका जंगल की जमीन पर दावा नहीं बनता। वनाधिकार कानून दो किस्म के लोगों को जंगल में रहने का अधिकार देता है। एक तो वे, जो आदिवासी हैं और जंगल में रहते हैं, और दूसरे, जो वनवासी हैं और वन उत्पादों पर निर्भर हैं। 2006 में बने वनाधिकार कानून की वैधता को तब कई संगठनों ने चुनौती दी थी। उनके विरोध के बाद उन लोगों की पहचान का काम शुरू हुआ, जिनकी जंगलों पर दावेदारी बनती थी। विगत नवंबर तक करीब 42 लाख लोगों ने अपनी दावेदारी पेश की थी, जिनमें से जांच के बाद 19 लाख लोगों की दावेदारी खारिज कर दी गई। दावेदारी खारिज होने वालों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, पर वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। दरअसल ये लोग जांच के दौरान 13 जरूरी दस्तावेजों में से एक भी पेश करने में नाकाम रहे। ये बेचारे दस्तावेज लाएं भी, तो लाएं कहां से। सदियों से जंगल को अपना घर मानने वाले और वहीं अपनी जिंदगी गुजार देने वाले इन वनवासियों के पास तो कुछ है ही नहीं। अदालत के आदेश का सबसे ज्यादा असर मध्य प्रदेश और ओडिशा में होगा, जहां क्रमशः साढ़े तीन लाख और डेढ़ लाख लोगों के वनाधिकार दावे खारिज हुए हैं। वर्ष 2002 से 2004 के बीच तीन से सवा तीन लाख आदिवासियों को उनके घरों से बेदखल किया जा चुका है। अब फिर वही स्थिति बन रही है। ऐसा लगता है कि विस्थापन इनकी नियति बन चुका है।


आज तक कभी औद्योगिक विकास, कभी रेल लाइन बिछाने, कभी अभयारण्य बनाने, तो कभी नदी-जोड़ के नाम पर ये हमेशा अपनी जमीन से खदेड़े जाते रहे हैं। किसी भी सरकार ने इनके पुनर्वास के सवाल पर सोचना तक गवारा नहीं किया। एडवोकेसी ग्रुप कैंपेन फॉर सर्वावाइवल ऐंड डिग्निटी का आरोप है कि खुद केंद्र सरकार इस मामले में कानून का बचाव करने में नाकाम रही है। भारी संख्या में गलत तरीके से दावों को खारिज किया गया है और वन अधिकारियों ने जान-बूझकर अवैध रूप से लोगों के अधिकारों को मान्यता देने से रोकने का काम किया है। पर सरकार के लिए भी इस समस्या से निपटना आसान नहीं है।

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