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बलूच नेता बुगती कहां जाएंगे

अवधेश कुमार Updated Thu, 30 Nov 2017 06:25 PM IST
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अवधेश कुमार
एक समय बलूचिस्तान से जुड़ी खबरें भारतीय मीडिया की सुर्खियां बनने लगी थीं। आज स्थिति वैसी नहीं है। बलूचिस्तान संघर्ष के अग्रणी नेता और बलूच रिपब्लिकन पार्टी के संस्थापक ब्रह्मदाग बुगती की शरण देने की याचिका स्विट्जरलैंड ने खारिज कर दी। माना जाता है कि ऐसा उसने पाकिस्तान की रिपोर्ट पर किया है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस दिन पाकिस्तान में बैठकर भारत में दहशतगर्दी फैलाने वाले आतंकी को रिहा किया गया, उसी दिन बलूचों के अधिकारों के लिए लड़ रहे नेता ब्रह्मदाग बुगती की शरण याचिका खारिज हो गई। क्यों? क्योंकि पाकिस्तान के लिए वह मोस्ट वांटेड यानी अति वांछित अपराधियों में शामिल हैं। सवाल है कि बलूच नेता को यदि स्विट्जरलैंड में शरण नहीं मिलती है, तो वह कहां जाएंगे। पाकिस्तान में वापस आ नहीं सकते। वहां लौटने का मतलब है, फांसी। ऐसे समय स्वाभाविक ही हमारा-आपका ध्यान अपने देश भारत की ओर आता है कि आखिर वह इस मामले में क्या कर रहा है?


यह प्रश्न इसलिए मौजूं है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2016 को स्वयं लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान और गिलगित बाल्टिस्तान का नाम लिया था। हालांकि उसमें उन्होंने भारत की भूमिका या वहां के संघर्ष के बारे में कुछ नहीं कहा था, पर इसका संदेश यही था कि भारत दोनों जगहों पर जनता के संघर्ष के पक्ष में है। यह बहुत बड़ा बयान था और इसका असर भी हुआ। दोनों स्थानों पर पाकिस्तान से आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को लगा कि भारत का हाथ उनकी पीठ पर आएगा। कुछ समय तक मीडिया में भी हलचल रही। यह खबर भी आई कि भारतीय विदेश मंत्रालय पाकिस्तान से बाहर रह रहे दोनों जगहों के लोगों से संपर्क करके उन्हें एकजुट करने की कोशिश करेगा। बुगती सहित कुछ दूसरे नेताओं को भारत में शरण देने की बातें भी सामने आईं। किंतु धरातल पर आज तक कुछ दिखा नहीं।


पहले खबर यह थी कि बुगती भारत में शरण लेंगे। जेनेवा स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास में उनके जाने का अर्थ यही लगाया गया था। अब सुना जा रहा है कि उन्होंने आवेदन ही नहीं किया या फिर उन्हें कहा गया कि आप अभी आवेदन मत करिए। बुगती ने कहा है कि शरण देने पर दूतावास से चर्चा हुई थी, पर उन्होंने आवेदन नहीं किया था। भारत की अपनी समस्या भी है कि यहां शरण देने या शरणार्थी को लेकर कोई निश्चित कानून है ही नहीं। इससे भी मामला फंसा होगा। जो भी हो, यह गंभीर स्थिति है, जिसमें भारत की भूमिका होनी चाहिए थी। बुगती बलूच आजादी आंदोलन के प्रतीक हैं। अगर उन्हें कहीं शरण नहीं मिली, तो पूरा आंदोलन कमजोर हो जाएगा।


भारत को इस विषय पर पूरी गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार को एक निश्चित बलूच नीति बनानी चाहिए और उस पर आगे बढ़ना चाहिए, भले इसे सार्वजनिक न किया जाए। दुर्भाग्य से भारत अब पूरे मामले में कहीं दिखता ही नहीं है।


नीतिविहीनता की यह स्थिति केवल बलूचिस्तान के मामले में ही नहीं है। पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर भी एक समय जो उम्मीद जगी थी, वह ठंडी पड़ गई है। इस समय पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, पाकिस्तान से आजादी मांग रहे हैं, वह एक अवसर है। सच कहा जाए, तो इन सारे मामलों में हमारे प्रधानमंत्री के वक्तव्य की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है। लालकिले की प्राचीर से बोलने के बाद दुनिया देख रही है कि भारत सिर्फ बोलता है या कुछ करता भी है। 
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