जीएसटी का केंद्रीय और राज्य स्तर पर क्या प्रभाव पडेगा, इस पर तो चर्चा होती रही है। पर जिस देश में 2,40,930 पंचायतें है और जिनमें 31 लाख से अधिक जनता के प्रतिनिधि विभिन्न स्तरों पर कार्यरत है, वहां जीएसटी का पंचायतों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर चर्चा नहीं हो रही। यह स्थिति गंभीर है, क्योंकि पंचायतों को 73वें संविधान संशोधन द्वारा स्वायत्त शासन की संस्थाओं का दर्जा देते हुए कहा गया था कि पंचायतें अपने स्तर पर आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाएं। 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को अस्तित्व में आए दो दशक से अधिक हो गया है, पर ये संस्थाएं अब भी राज्य या केंद्र सरकार के भरोसे हैं। जीएसटी के लागू होने के बाद इनकी स्थिति और दयनीय होने वाली है, क्योंकि इनके पास वित्तीय संसाधनों की कमी होने वाली है।
केद्रीय जीएसटी तथा राज्य जीएसटी इसके दो अंग है। इसके अलावा एकीकृत जीएसटी भी है, जो राज्यों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति पर केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाएगा। पंचायतों द्वारा विज्ञापन कर, मनोरंजन कर आदि लगाने का प्रावधान है, पर इन सबका जीएसटी में विलय हो गया है। अब पंचायतें ये कर नहीं लगा सकतीं। हां, मनोरंजन कर कुछ समय के लिए लगा सकती हैं, पर बाद में उसका भी जीएसटी में विलय हो जाएगा। जीएसटी का पंचायतों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इससे इनके वे संसाधन समाप्त हो सकते हैं, जो इस समय उनके पास हैं, क्योंकि राज्य एवं पंचायतों के बीच संस्थानों के बंटवारे का कोई फॉर्मूला नहीं है।
पंचायतों की अर्थव्यवस्था अनुदान आधारित अर्थव्यवस्था है, क्योंकि ये संस्थाएं केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से संसाधन प्राप्त करती है। राज्य वित्त आयोग से भी पंचायतों के पास संसाधन आते हैं। चौदहवें वित्त आयोग द्वारा ग्राम पंचायतों को दो लाख करोड़ से अधिक अनुदान पांच वर्षों के लिए दिया गया है। पंचायतों के पास अगर कर या फीस लगाने का प्रावधान है, तब भी ये संस्थाएं ये कर या फीस इस डर से नहीं लगातीं कि इससे कहीं इनके चुने हुए प्रतिनिधि स्थानीय स्तर पर अप्रिय न हो जाएं।
पंचायतें अपने स्तर पर संपत्ति कर व व्यवसाय कर लगा सकती हैं। जहां पर ये संस्थाएं कुछ सेवा-जैसे पीने का पानी, सफाई आदि की सुविधा ग्रामीणों को उपलब्ध करा रही हंै, उन पर सेवा शुल्क लगा सकती हैं। अभी तक स्थिति तो बड़ी गंभीर है, क्योंकि ये संस्थाएं कर लगाती ही नहीं।
इस संदर्भ में कुछ बातें कहना उचित प्रतीत होता है। अगर पंचायतें जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करती हैं, तो उन पर जीएसटी नहीं लगेगा। पंचायतों को संविधान के अनुच्छेद 243- जी को ध्यान में रखकर जो कार्य राज्य सरकार ने हस्तातंरित किए है, उनमें शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी कार्य हो सकते हंै, उन पर कर नहीं लगेगा। पर अगर कोई पंचायत आय सृजन का कार्य कर रही है-वह कोई उद्योग-धंधा हो सकता है या पंचायत की संपत्ति से प्राप्त लगान हो सकता है, तो उस पर कर लगेगा, अगर इस गतिविधि से प्राप्त आय 20 लाख से अधिक है। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के पंचायत उद्योग का उदाहरण दिया जा सकता है। दूसरा उदाहरण, पंचायतों के पास शामलात जमीन कर हो सकती है। जैसे हरियाणा में पंचायतों के पास इस तरह की जमीन है। हरियाणा में इस स्रोत से प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2015 में 233.04 रुपये थी, जो भारत में सर्वाधिक थी।
जीएसटी के संदर्भ में पंचायतों को क्या करना चाहिए, ताकि उनकी आवाज सुनी जा सके और वे संसाधनों के बंटवारे में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकें? चूंकि पंचायतें भी स्थानीय स्तर पर सरकार है, इसलिए उन्हें आवाज उठानी होगी कि उन्हें भी राज्य सरकार की जीएसटी के संदर्भ में गठित समिति में भागेदारी दी जाए, ताकि वे अपनी बात इस समिति में रख सकें।
दूसरे, पंचायतें भी कर एवं गैरकर के प्रावधान के माध्यम से, जो पंचायती राज अधिनियम में दिए गए हैं, वित्तीय संसाधन जुटाएं। उन्हें इस डर से निकलना होगा कि अगर वे कर लगाएंगे, तो अप्रिय हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि पंचायतों के पास साधन जुटाने के स्रोत नहीं हैं। देश में जनगणना नगर अर्थात ‘सेन्सस टाउन’ की संख्या 2001 के 1,362 से बढ़कर 2011 में 3,894 हो गई है। ‘सेन्सस टाउन’ उन गांवों को कहते हंै, जिनकी जनसंख्या 5,000 हो और जहां के कुल मुख्य कर्मियों में से कम से कम 75 प्रतिशत गैर कृषि कार्य में लगे हों और जहां जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति किलोमीटर हो। और भी बहुत संख्या में ग्राम पंचायतें हैं, जहां कर एवं गैर कर, दोनों तरीके से संसाधन जुटाए जा सकते हैं। जीएसटी के पीछे शायद यह भी एक उदेश्य है कि पंचायतें अपनी क्षमताओं को इस्तेमाल में लाएं।
तीसरे, पंचायतों को केंद्रीय एवं राज्य वित्त आयोग के माध्यम से बहुत-सा पैसा जा रहा है, जिनसे गांवों में स्ट्रीट लाइट, सफाई आदि उपलब्ध कराया जा रहा है। पंचायत उनसे ‘यूजर्स चार्जेज’ ले सकती है। अगर पंचायतें केंद्र व राज्य सरकारों से प्राप्त संसाधन ही खर्च करेंगी, तो वे एक एजेंसी के रूप में ही काम करंेगी। पर अगर वे स्वयं के संसाधन जुटाती हैं, उसे लोगों की भागीदारी से गांव के विकास में लगाती हैं, तो पंचायत राज ग्राम राज्य होगा।
चौथा, पंचायतों की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है। अभी तो सभी पंचायतों के पास अपनी बिल्डिंग भी नहीं है। 2015 के आंकड़े के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 33 प्रतिशत ग्राम पंचायतों के पास अपनी बिल्डिंग नहीं थी। बिहार में तो 81 प्रतिशत पंचायतों के पास बिल्डिंग नहीं है। पंचायतों के पास उचित संरचना हो, ग्राम, सचिव उचित संख्याओं में हों, उनके अपने दस्तावेज रखने की सुविधा हो, तभी वे प्रभावी रूप से कार्य कर सकती हैं। पंचायत प्रतिनिधि खड़ंजे और नाली बनवाने की मानसिक सोच से बाहर आएं, तभी पंचायतें अपनी बात विभिन्न समितियों के माध्यम से रख सकती हैं।
-लेखक पंचायती राज मामलों के विशेषज्ञ हैं