स्वतंत्रता के बाद देश में औद्योगिकीकरण तथा बेरोजगारी खत्म करने के लिए बहुत-सी योजनाएं बनीं और इन योजनाओं को संस्थागत रूप देने के लिए औद्योगिक विकास प्राधिकरणों का गठन देश के बहुत से महानगरों तथा नगरों के आसपास किया गया। इन प्राधिकरणों को स्थापित करने का मुख्य उददेश्य था कि उद्योग स्थापित करने के लिए सारी सुविधाएं एक खिड़की से उपलब्ध हो जाएं, जैसा कि अक्सर सरकारें निवेश आकर्षित करने के लिए उद्योगपतियों तथा विदेशी निवेशकों से वायदा करती हैं। और इस उददेश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली के चारों तरफ नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, बहादुरगढ़, फरीदाबाद इत्यादि शहरों का विकास नए सिरे से किया गया। इसी उद्देश्य की प्रमुखता को ध्यान में रखने के लिए तीन क्षेत्र बनाए गए- न्यू ओखला इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा), वृहत्तर न्यू ओखला इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट (ग्रेटर नोएडा) तथा यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास अथॉरिटी (येडा)।
औद्योगिकीकरण इन तीनों में मुख्य उददेश्य था, जिसके लिए अंग्रेजों द्वारा बनाए भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 का खुलकर प्रयोग करके प्रदेश सरकार ने इस क्षेत्र की ज्यादातर भूमि का अधिग्रहण समय-समय पर किया। उद्देश्य था कि 70 प्रतिशत भूमि का उपयोग उद्योगों तथा संस्थाओं के लिए किया जाएगा, परंतु औद्योगिकीकरण के उद्देश्यों की धज्जियां उड़ाते हुए राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों की मिलीभगत से इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत भूमि का आवासीय तथा व्यावसायिक उपयोग किया गया और केवल 10 प्रतिशत भूमि ही उद्योगों के लिए छोड़ी गई। इस 10 प्रतिशत भूमि में भी समुचित औद्योगिक वातावरण न होने के कारण नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा येडा में अभी तक कोई ऐसी औद्योगिक इकाई स्थापित नहीं हो सकी, जिसमें स्थानीय व देश के अन्य हिस्सों से आए बेरोजगार नौजवानों को रोजगार मिल सके।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने के कारण बहुत से लोग इस क्षेत्र में अपने लिए आवास की चाह रखते हैं। इसलिए बिल्डरों ने अधिकारियों तथा प्रभावशाली सत्ताधारियों को भारी रकम देकर इस क्षेत्र को रियल स्टेट की मंडी बना दिया। इन बिल्डरों ने खरीदारों को सुहावने सपने दिखाकर फंसाया। अभी लाखों खरीदार फ्लैटों के लिए बिल्डरों के ऑफिसों के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं। प्राधिकरण कर्मियों ने नोएडा एक्सटेंशन के 16 गांवों की जमीनों का लैंड यूज बदलने के लिए बिल्डरों से करीब 30 प्रतिशत जमीन की कीमत रिश्वत के रूप में ली और उसके बाद जमीन की केवल 10 प्रतिशत कीमत लेकर उसे बिल्डरों को दे दी। बिल्डरों ने खरीदारों से ली ज्यादातर रकम संबंधित अधिकारियों को रिश्वत के रूप में दे दी और अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अन्य योजनाओं में उसे खर्च कर दिया। अब इन बिल्डरों के पास आवासीय योजनाओं को पूरा करने के लिए धन ही नहीं है।
औद्योगिकीकरण के नाम पर रियल एस्टेट मंडी बनने से जहां मकान खरीदारों के साथ धोखा हुआ, वहीं बेरोजगारों के साथ भी। यदि इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में योजना के अनुसार औद्योगिकीकरण हो गया होता, तो लाखों बेरोजगारों को रोजगार मिलता और देश का औद्योगिक उत्पादन भी बढ़ता। जिस गंगा-यमुना के दोआब में उपजाऊ जमीन फलों और सब्जियों से भरी होती थी, आज वह कंकरीट के जंगल के रूप में अपने हाल पर रो रही है। सरकार को इसका पता लगाना चाहिए कि इन औद्योगिक विकास प्राधिकरणों ने कितना औद्योगिकीकरण किया है।