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तब पैसा कहां फलता है?

Sat, 29 Sep 2012 09:42 PM IST
मृणाल पांडे
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पैसा पेड़ों पर नहीं फलता, यह पुरानी कहावत एकदम सही है। लेकिन पेड़ों पर नहीं, तो फिर वह कहां फलता है? समृद्धि को बढ़ाने वाली देवी लक्ष्मी को संस्कृत में चंचला यों ही नहीं कहा गया। पूंजी फलती है जब वह तेजी से क्रियाशील होती है। और दुनिया भर में फल-फूल रहे पैसे की गति के पीछे शेयर बाजार, उद्योग जगत, खेती, हर कहीं एक आश्चर्यजनक और कालातीत गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत काम करता है, जिसके तहत पैसा पैसे को खींचता है।
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इसीलिए अमीर हर बरस अधिक अमीर होते जा रहे हैं, जबकि हर कहीं गरीब या तो जस के तस हैं या और अधिक गरीब हो गए हैं। इधर पिछले कुछ दिनों के दौरान खदान आवंटन से बैंक सुधार तक और रियल एस्टेट से खेती-बाड़ी तक के क्षेत्रों की बाबत कई रोचक कहानियां अखबारों में छपीं, जो साबित करती हैं कि आज भी पूरी दुनिया में वैसी ही विषमता है।

जिन अमेरिकी और यूरोपीय बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा 2007-08 में चालाक स्कीमों के मार्फत वहां इतने भारी घोटाले किए गए, जिनसे लाखों वेतनभोगी मध्यवर्गीय बेरोजगार हो गए, उनको सजा के बजाय सरकारी सबसिडियां मिलीं, ताकि बड़े लोगों का पैसा न डूबे।
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बैंक ऑफ जापान के एक हालिया शोध ने भी पुष्ट किया है कि चीन, थाईलैंड, कोरिया हर कहीं अमीर अधिक अमीर हो रहे हैं, क्योंकि वे अतिरिक्त पूंजी के मालिक हैं और शेयर बाजारों में पैसा लगाने और डूबते उपक्रमों को औने-पौने खरीदने की क्षमता रखते हैं। तिस पर मंदी के तहत दी जा रही रियायतों और छूटों का भी वे ही सबसे अधिक फायदा पा रहे हैं।

जब से बैंकिंग व्यवस्था की चूलें हिली हैं, दुनिया भर के वेतनभोगी मध्यवर्ग के पास बड़े वित्तीय दांव पर लगाने लायक अतिरिक्त पैसा रहा ही नहीं, और महंगाई उनकी जतन से जोड़ी उस सीमित बचत को भी चाट रही है, जिसे अब वे दांव पर लगाने से बच रहे हैं। एक फीसदी से कम ब्याज दर दे रहे बैंकों में पड़ी-पड़ी उनकी कमला कुम्हला रही है।

भारत में भी यही संकट है। लिहाजा आज उसकी पढ़ी-लिखी और बचतशील आबादी की सच्ची बुनियादी प्राथमिकताएं दो हैं-एक, राजनीतिक स्थिरता, और दो, आर्थिक विकास। लेकिन लोकतंत्र में इन दोनों को हासिल करने चलें, तो सरकार और विपक्ष के बीच, खुद सरकारी प्राथमिकताओं के बीच परस्पर टकराव तय है। मसलन, विज्ञान का नियम कहता है कि हर असमतल जमीन में पानी अपना स्तर खोजकर उसी तरफ बहेगा। अत: पूंजी का सहज बहाव पूंजीवालों की ही तरफ होता है।

बाहरी निवेशक भी तरक्कीपसंद संपन्न राज्यों में ही पैसा लगाने में रुचि लेते हैं, गांव-जवार के अविकसित बाजारों में नहीं। पर हमारे पढ़े-लिखे मध्यवर्ग को पूंजी के रुझान और अपनी महत्वाकांक्षाओं को खुलकर ईमानदारी से स्वीकार करने में झिझक महसूस होती है। लिहाजा वे बाहर, जो आवे संतोष धन सब धन धूरि समान या पैसा हाथ का मैल है आदि कहें, निजी जीवन में कई बार उसके एकदम उलट व्यवहार करते हैं।

पर्यटन या अध्ययन को विदेश जाना या विदेशी माल से भरे मॉल में घूमना-खरीदारी करना अधिकतर परिवारों की गुप्त प्राथमिकता है, पर विदेशी पूंजी निवेश या कॉरपोरेट घरानों द्वारा कारखाने लगाने का वे कई राज्यों में हाथ में तख्ती लेकर मोमबत्ती जलाकर विरोध कर रहे हैं। उनको सस्ती और निरंतर बिजली सप्लाई, सस्ता लोहा, सीमेंट चाहिए, कम दर पर हाउस लोन चाहिए, बढ़िया फल-सब्जी चाहिए, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण, रिटेल व्यापार में बाहरी समूहों की आवक पर रोक या नई खदानों के हिंसक विरोध को वे टीवी पर कतई जायज बताते हैं।

विपक्षी दल यह पाखंड समझते हैं, पर जब तक वे खुद शासन में न हों, किसी भी चलती हुई लोकतांत्रिक संस्था को ठेंगा दिखाने में उनको अपना फायदा दिखता है, सो न वे संसद चलने देते हैं और न ही केंद्रीय योजनाओं को अपने शासित राज्यों में लागू होने देते हैं। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री ने ताबड़तोड़ विकसित शहरों की विकास व्यवस्था में भी अविलंब सुधार और बाजार की ताकतों से शहरी विकास का तालमेल बनाने की जरूरत रेखांकित की है, जबकि विपक्ष शहरी सीलिंग का मुखर विरोधी बना हुआ है।

इसी बीच खुद राजधानी दिल्ली में नौ सौ से अधिक अवैध बस्तियां वैध किए जाने का ऐलान कर दिया गया है, इस पर सब खामोश हैं। झुग्गियों के वोट किसे नहीं चाहिए? हर मंत्री कहता है कि मास्टर प्लान के अनुसार शहरी विकास तय करना ही होगा। पर मास्टर प्लान बनाने-निभाने की परंपराएं और ईमानदार नियामक संस्थाएं कायम रखने में कितना सच्चा जनसहयोग है?

जिस देश में जाति और धर्म से जुड़े आग्रहों के खौफनाक गुहामानवों वाले पीर पंजाल सत्ता के बीचोबीच सदियों से खड़े रहे हों, वहां अगर दिन में शिखर नेतृत्व इन मूल्यों पर माल्यार्पण करें, जबकि उनका दल रात को उन्हीं के नीचे डाइनामाइट लगाता रहे, तब सिर्फ शिखर पर मौजूद सदिच्छा और हौसला अफजाई से क्या होता है?

लोकतंत्र में एक चतुर कुशल शासक विभिन्न हितस्वार्थों में जहां तक बन सके, एक संतुलन कायम रखता है। और हर गुट के हित स्वार्थों को कभी पैकेजों से, कभी बातों और लातों से निपटाया जाता है। अमेरिका में इन्हीं दबावों के तहत ओबामा आउटसोर्सिंग का विरोध और अच्छे तालिबान का हैरतअंगेज समर्थन करते हैं। और इन्हीं के तहत इंग्लैंड में वीजा शर्तें सख्त कर दी जाती हैं।

यकीन न हो, तो देखें कि अपने यहां भी ऊपरखाने चाहे सब दल सत्तारूढ़ दल को नीचा दिखाने को त्यागी अपरिग्रही बन रहे हों, लेकिन अपने दल के शासित प्रदेशों में पूंजी का चरागाह सर्वजनसुलभ बनाने को, सांगठनिक तौर से जरूरी, लेकिन सख्तमिजाज अनुशासनपसंद नेताओं को मुख्यमंत्री पद देने पर वे कितने राजी हैं?

तो एक वयस्क लोकतंत्र में लज्जा रेखाएं कहां और किस तरह बनें, इसके लिए दो बातें जरूरी हैं। एक: देश का शासन शिखर पर जो संभाले, वह देश तथा दल, दोनों में निर्विवाद नेता हो। दो : देश में सत्ता तथा विपक्ष का वृहत्तर आधार अखिल भारतीय व्याप्ति वाली राष्ट्रीय पार्टियां रचें, ताकि सारी खींचातानी राष्ट्रीय हित के दायरों के भीतर सीमित रहे। क्षेत्रीय क्षत्रप यदि तीसरा चौथा या पांचवां संगठन भी बनाएं, तो हर्ज नहीं, लेकिन उन गुटों की एकजुटता का आधार धर्म या जातिगत वजहों से देश का विभाजन नहीं बनने दिया जा सकता।
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