पहाड़ आज आपदा से जूझ रहा है, मगर हकीकत यह है कि आपदा आने से पहले ही वहां की स्थिति कोई अच्छी नहीं थी। आज विकास को लेकर बहसें चल रही हैं, लेकिन सही मायने में विकास की रोशनी गांवों तक तो पहुंची ही नहीं है। इसी वजह से रोजगार के सिलसिले में पहाड़ियों को अपने घरों से बाहर जाना पड़ता है।
मगर पहाड़ी चाहे जहां रहें, येन-केन पैसा बचाकर छुट्टियों में और अक्सर गर्मियों में अपने गांव का रुख जरूर करते हैं। इन गर्मियों में मैं भी अपने गांव गया, लेकिन वहां जाकर मुझे खासी निराशा हुई। सरकारी योजनाओं का पैसा सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है। राजीव गांधी ने कभी कहा था कि रुपये का 15 पैसा ही लोगों तक पहुंच पाता है। हालत देखकर तो लगता है कि अनेक लोगों तक एक पैसा भी मुश्किल से पहुंच पा रहा हो।
सूचना के अधिकार के तहत निकाली गईं जानकारियां पहाड़ के गांवों की हकीकत बयान कर देती हैं। एक पंचायत के उदाहरण पर गौर करें। वहां अप्रैल, 2012 से नवंबर 2012 तक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत 70,000 रुपये खर्च हुए, मगर वहां न दवा मिलती है और न ही किसी तरह का इलाज होता है। दीनदयाल आवास योजना और इंदिरा आवास योजना के तहत मिलने वाली राशि तो हमारे गांव की दो महिलाओं के पिताओं को उनका पति बताकर ही हड़प ली गई! यही हाल मनरेगा का है, जिसके तहत ऐसे व्यक्ति के बच्चों तक को सूची में दर्ज कर पैसा दिला दिए गए, जिसके पास तीन-तीन ट्रक हैं। यही हाल बीपीएल व अंत्योदय कार्डधारकों का है।
मसलन ऐसे लोगों के भी अंत्योदय कार्ड बनाए गए हैं, जिनके पास खुद की कार है। मगर यह सब कब तक छिपा रह सकता था। आखिर सरकार की नींद खुल ही गई। मेरे क्षेत्र के उप जिला अधिकारी ने अप्रैल माह में मनरेगा को छोड़कर अन्य परियोजनाओं की जांच की। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, अधिकतर कार्य हुए ही नहीं, पर खर्च दिखा दिया गया। यदि पिछले पांच वर्षों में सरकार द्वारा दिए गए धन का पचास फीसदी भी इन कार्यों में खर्च हो गया होता, तो आज हमारे गांव की सूरत बदल गई होती, जिसकी आबादी मात्र 200 है।
यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। उत्तराखंड के तमाम गांव बदहाली के शिकार हैं। स्वास्थ्य सेवाओं को ही देखिए। प्रदेश सरकार ने आनन-फानन में 539 आयुष डॉक्टरों की तदर्थ नियुक्ति कर दी। इसे चुनौती देने पर उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि इन पदों पर नियुक्तियां लोक सेवा आयोग के माध्यम से की जाएं। क्या सरकार यह नहीं जानती थी कि वह इस तरह की तदर्थ नियुक्तियां नहीं कर सकती? इससे हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
जाहिर है, घोटालों की आंच से सिर्फ दिल्ली ही झुलस नहीं रही है, इसकी ज्वाला गांव-गांव तक फैल चुकी है। वैसे भी अब लेने-देने को कोई बुरा नहीं मानता, क्योंकि साधारण जनता के सामने काम करवाने का मात्र यही रास्ता बचा है। बिना इसके फाइल किसी स्तर से आगे बढ़ती ही नहीं। बिना इसके तो भोजन से कफन तक नहीं मिलता। इसका असर लोगों के चरित्र एवं नैतिकता पर पड़ा है।
अनैतिक रूप से कमाया धन लोगों को और गलत करने को प्रेरित कर रहा है। जुर्म दिनों दिन बढ़ रहे हैं। गलत काम करने की तौबा टूट गई है। सरकारी कर्मचारी जनता से मिलकर सरकार का ही पैसा लूट रहे हैं। बेईमानी से ही कमा रहे हैं और पकड़े जाने पर बेईमानी से ही छूट जाते है। बेईमानी से अर्जित धन का हमारी अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर पड़ा है। नतीजतन, एक वर्ग को तो रोजगार नहीं मिल पा रहा है, वहीं एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है, जिसे किसी भी तरह के खर्च से गुरेज नहीं रहा।
2जी, कॉमनवेल्थ गेम्स, कोयला और न जाने कितने तरह के घोटालों का शोर सब ओर सुनाई दे रहा है, मगर न तो केंद्र को और न ही राज्य सरकार को यह एहसास है कि आम लोग रोजमर्रा के जीवन में होने वाले घोटालों से कहीं अधिक त्रस्त हैं। इसे रोकने में दोनों ही सरकारें पूर्णतया विफल रही हैं, इसका उन्हें चुनावों में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है, फिर वह चाहे जब भी हों।