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किस दिशा में जा रहा है भोजपुरी समाज

Sun, 03 May 2015 04:12 PM IST
परिचय दास
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अगर भोजपुरी समाज का कोई लेखक किसानों और मजदूरों से बात करना चाहता है, तो उसे उस भाषा में जरूर लिखना चाहिए, जो वहां के मजदूर-किसान बोलते हैं-अर्थात भोजपुरी में। भोजपुरी में लिखने का अर्थ वह सब करने के दायित्व से बंधा होना है, जो इलियट, कीट्स या शेक्सपियर ने अंग्रेजी के लिए किया, ज्यां पाल सार्त्र ने फ्रेंच के लिए किया तथा विश्व इतिहास में सभी लेखकों ने अपनी-अपनी भाषाओं के लिए किया।
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भोजपुरी समाज की वर्तमान स्थिति को देखें, तो पता चलता है कि खेती-किसानी की हालत अच्छी नहीं है, उद्योगों की कमी के चलते मजदूरों का अपने इलाके से पलायन जारी है। गांव-घर मुकदमों से पटे पड़े हैं, आपराधिक व राजनीतिक हिंसा जारी है। भट्ठे खोलना और स्कूल खोलना-दो ही धंधे गांवों में प्रमुख हो गए हैं। व्यावसायिक फसलों का नितांत अभाव है तथा पारंपरिक खेती से उचित प्राप्ति न होने के कारण पेट चलाना मुश्किल है। गांवों में युवकों के पास काम न होने के कारण अधिकांश की दिशा गलत हो रही है। इस तरह पूरे अंचल के सामने वर्तमान व भविष्य के अस्तित्व का गहरा संकट है। सड़कों का पुनरुद्वार होना कठिन होता जा रहा है तथा पर्याप्त बिजली न होने की वजह से औद्योगिक व कृषि संस्थानों पर गहरा असर हो रहा है। पानी का स्रोत लगातार घट रहा है और नदियों में इस कदर प्रदूषण बढ़ रहा है कि 'पवित्र' शब्द सिर्फ अंतस की भावना होकर रह गया है। गांवों की पारिस्थितिकी (इकॉलॉजी) तेजी से बदल रही है। जानवरों का पालना दूभर होता जा रहा है, क्योंकि उनके भरण-पोषण का खर्च उठाना आसान नहीं रह गया है। चरागाह सिमटते जा रहे हैं, वनों की अंधाधुंध कटाई जारी है, बाग उजड़ते जा रहे हैं। यंत्रों ने आराम जरूर पहुंचाया है, लेकिन उनकी सुविधा प्राप्त करने की आर्थिक कठिनाई मारक बन गई है। लोगों के आपसी संबंधों में जटिलता आ रही है, सहजता खत्म हो रही है। गांवों की गुटबाजी व अपराध के धंधे इस कदर बढ़ते गए हैं कि गांवों की आत्मा की संरचना ही अनपहचानी-सी लगने लगी है। राजनीति का कार्य देश के शरीर व मन का स्वस्थ विकास करना था, वह अब इस अंचल के लिए वोटों की सौदागरी में बदलती जा रही है, जिससे स्वच्छंद ताकत व सत्ता पाई जा सके। बंदूकों की मानसिकता समाज का नया विधान रच रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार में इसे देखा जा सकता है।

भोजपुरी अंचल में पहले महिलाएं शादी-ब्याह के अवसर पर पारंपरिक गीत गाती थीं। अब एक तो इस तरह की रस्में खत्म होती जा रही हैं, अगर बची हैं, तो फिल्मी गीतों के रूप में। आनुष्ठानिक गीत भी अब फिल्मी धुनों में गाए जाते हैं। शहरों के अधकचरे असर गांवों पर पड़ रहे हैं। मुंबई से चला फैशन दिल्ली होते हुए भोजपुरी अंचल में पहुंचता है। भोजपुरी लोक गायकों व लोक नर्तकों के बदले सार्वजनिक रूप से वीडियो फिल्म देखना नई स्टाइल है। टीवी ने पारस्परिक संबंधों के विस्तार में कटौती की है। भोजपुरी में बनने वाली फिल्में ज्यादातर पॉपुलर किस्म की होती है। लोग अगर भोजपुरी फिल्में देखते हैं, तो इसलिए कि उनमें अब भी उनका जीवन व धुन रिफ्लेक्ट होते हैं, जो हिंदी फिल्मों में कम होता जा रहा है।
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आज भी भोजपुरी में एक दैनिक अखबार नहीं है। ऐसी कोई पत्रिका नहीं, जिसकी पहुंच सुदूर अंचल के लोगों तक हो। भोजपुरी में बात करना कम होता जा रहा है, वह सिर्फ गांवों तक सिमट कर रह गई है। चार शिक्षित लोग अगर इकट्ठा होकर बात करें-भोजपुरी के बदले हिंदी का प्रयोग होता है। पढ़े-लिखे लोगों व संभ्रांत लोगों के अपने रिश्तेदार आ जाएं, तो मजाल कि भोजपुरी में बात करें! सर्वेक्षण में पाया गया है कि भोजपुरी को वैसी ही हीनता ग्रंथि का सामना हिंदी से करना होता है, जैसी हिंदी को अंग्रेजी से। इसलिए भोजपुरी का नया अन्वेषण जरूरी है।

गांवों में खटिया-बुनाई, चटाई-बुनाई, भेड़ के ऊन से कंबल-बुनाई, बांस की खपच्चियों का आर्ट, गांव की भीत (दीवार) के ऊपर उकेरी कला का निरंतर खात्मा हो रहा है। कबड्डी, चिकई, खो-खो, फर्री, लंबी-कूद, ऊंची कूद, कुश्ती इत्यादि खेल गुजरे जमाने की चीजें हो गई हैं। क्रिकेट सबसे अधिक लोकप्रिय है। कभी भोजपुरी गांवों में हाथ की गेंद (वॉलीबाल) सबसे आकर्षक खेल होता था, जिसके बड़े से बड़े टूर्नामेंट आयोजित होते थे। गुल्ली-डंडा अब शायद ही कहीं दिखे।

भोजपुरी अंचल में शिक्षा में नयी चेतना आई है। क्रय शक्ति में भी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इतनी नहीं कि उसे अत्यंत उल्लेखनीय माना जाए। भोजपुरी समाज एक स्वाभिमानी व समय के अनुकूल व आगे चलने वाला समाज है। उसे अन्य जगहों पर प्रताड़ना सहनी पड़े, इसके विरुद्ध यह आवश्यक है कि भोजपुरी प्रदेशों के शासक जीविका के नए अवसर सृजित करें। भोजपुरी समाज की हर आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए योजनाएं तैयार की जाएं। उद्योगों के विकास के बिना समाज का आधुनिक विकास संभव नहीं। कृषि पर ध्यान देने तथा उसे लाभानुकूल बनाने से मजदूरों का पलायन काफी रुक सकता है। भोजपुरी अंचल के पर्यटन-स्थल उपेक्षित पड़े हैं, कलाएं मर रही हैं। इन पर एक कार्य योजना के अधीन तुरंत काम शुरू करना चाहिए।
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