समर्थ रामदास के संबंध में कहा जाता है कि उनका अपने इष्ट राम और उनके परिवार से संवाद होता था। हनुमान के संबंध में तो कहते हैं कि वह समर्थ रामदास के प्रति बहुत स्नेह रखते थे। एक बार समर्थ ने हनुमान से आग्रह किया कि जो भी उनके संकीर्तन में आए, उन सभी को वह दर्शन दें। हनुमान ने कहा, जिस दिन आप का शुद्ध कीर्तन होगा, उसी दिन मैं दर्शन देने आ जाऊंगा।
आस-पास के इलाकों में संकीर्तन की मुनादी हो गई। बड़ी संख्या में लोग आए। समर्थ ने कीर्तन करने वालों को बताया कि हनुमान जी भी आएंगे। लोग इधर-उधर झांकते रहे, मगर कहीं हनुमान जी नहीं दिखे। थोड़ी देर बाद लोगों को ऊब होने लगी। धीरे-धीरे वे संकीर्तन से उठकर जाने लगे। थोड़ी देर बाद वे लोग भी चले गए, जो हनुमान का नाम सुनकर आए थे।
समर्थ रामदास अब भी शुद्ध सत्संग के भाव में थे। उन्हें लोगों के जाने का भान नहीं हुआ। धीरे-धीरे वाद्ययंत्र बजाने वाले भी एक-दूसरे को इशारा करके खिसक गए। अब अकेले समर्थ रामदास बचे, तभी हनुमान जी आ गए।
अरे हनुमान जी, अब इन सत्संगियों को दर्शन दो- रामदास ने प्रेम भाव से कहा। यह सुनकर हनुमान जी बोले, वे हैं कहां? उन्हें जवाब मिला, सब बैठे हैं न! हनुमान जी ने हंसते हुए कहा, आप आंखें तो खोलो महाराज। मैं तो आ गया हूं, लेकिन आप के भगत कहां है?
समर्थ रामदास ने आंखें खोलीं, तो भौंचक रह गए। उन्होंने पूछा, भक्त कहां गए? हनुमान ने जवाब दिया, शुद्ध भाव नहीं था, तो शुद्ध सत के भाव में टिके नहीं। विषय-विकार और संसार का आकर्षण अशुद्ध है। जिस समय शुद्ध सत्संग होगा, मैं आऊंगा- ऐसा मैंने बोला था। आप के चित्त में शुद्ध विचार हैं, तो मैं आ गया हूं।