फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कहां खो जाते हैं बच्चे

Fri, 31 May 2013 08:50 PM IST
सुभाष गाताडे
विज्ञापन
विज्ञापन
राजधानी दिल्ली की नंदनगरी की शकुंतला (बदला हुआ नाम) के पास अपने बेटे की पुरानी तस्वीर आज भी है। तीन वर्ष हो चुके इस घटना को, जब वह खेलते समय गायब हो गया था।
विज्ञापन


थाने के कितने चक्कर लगाए, बड़े अफसरों से कितनी सिफारिशें कीं, मगर कोई सुराग नहीं मिल सका है। यहां तक कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज करना भी मुनासिब नहीं समझा था। यही स्थिति लखनऊ के अमीनाबाग के नाजिमा की है, जिनकी दो साल की बच्ची साल भर से गायब है।

निश्चित ही यह अकेली शकुंतला या नाजिमा की दास्तां नहीं है। मुल्क की आला अदालत द्वारा पिछले दिनों गायब होने वाले बच्चे एवं अपराध के शिकार अन्य बच्चों की हिफाजत के लिए सुनाया गया फैसला ऐसे तमाम मामलों में एक नई जमीन तोड़ता दिखता है।
विज्ञापन


'बचपन बचाओ आंदोलन' द्वारा गायब एवं अपहृत बच्चों के लिए डाली गई याचिका के बारे में प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर की त्रिसदस्यीय पीठ ने निर्देश दिया है कि आइंदा गायब होने वाले बच्चों के हर मामले को संज्ञेय अपराध के तौर पर दर्ज करना होगा और उसकी जांच करनी होगी।

ऐसे तमाम लंबित मामलों में, जिसमें बच्चा अब भी गायब है, अगर प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर नहीं की गई है, तो उनमें एक माह के अंदर रिपोर्ट दायर करनी होगी। अब हर थाने में यह अनिवार्य होगा कि वहां कम से कम एक पुलिस अधिकारी हो, जिसे बच्चों के खिलाफ अपराधों की जांच के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया हो।

गायब बच्चों को आला अदालत ने इस ढंग से परिभाषित किया है, ‘एक ऐसा व्यक्ति, जो अठारह साल से कम उम्र का हो, जिसके पता ठिकाने के बारे में उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावकों को पता नहीं है। ऐसे बच्चे को गायब बच्चे की श्रेणी में शुमार किया जाएगा, जिसे संरक्षण एवं देखभाल की जरूरत है।’

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से यहां हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब या अपहृत होता है, जिनमें से चालीस फीसदी कभी वापस नहीं मिलते। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा निर्देश के चंद रोज पहले महाराष्ट्र सरकार के ऐसे ही एक स्वागतयोग्य फैसले की खबर आई थी कि अगर महाराष्ट्र में 14 साल से छोटा कोई बच्चा गायब हुआ, तो उसे तत्काल ‘अपहृत’ समझा जाएगा और पुलिस महकमा उसी हिसाब से कार्रवाई करेगा।

सितंबर, 2012 में केंद्र सरकार के सामाजिक सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया था कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में सबसे अधिक पंजीकृत आंकड़े होते हैं, अपहरण के। जनवरी, 2013 में सरकारों की खिंचाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी थी, ‘आप अदालत को बेवकूफ बना रहे हैं, यह विडंबना ही है कि किसी को भी गायब बच्चों की फिक्र नहीं है।’

दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि इस मामले में सरकार के भीतर बेरुखी है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने कुछ समय पहले संसद में सवाल का जवाब देते हुए बच्चों के गायब होने का दोष माता-पिताओं पर मढ़ा था।

विडंबना यही कही जाएगी कि उन्होंने इस बड़ी सच्चाई को बताने की भी जरूरत नहीं समझी कि बच्चों के अवैध व्यापार में मुब्तिला अपराधी गिरोहों ने राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नेटवर्क कायम किया है, जो उन्हें यौन पर्यटन में धकेलने से लेकर बंधुआ मजदूरी करने के लिए मजबूर करता है। बच्चों को विद्रूप बनाकर उनसे भीख मंगवाने के काम में भी गिरोहों की संलिप्तता देखी गई है।
 
बच्चों की सुरक्षा के लिए बढ़ रही चिंताओं के बीच राजधानी दिल्ली से अलग ढंग का समाचार पढ़ने को मिला। पता चला कि दिल्ली पुलिस ने गायब या अपहृत बच्चों के अनसुलझे मामलों की संख्या को अपने रिकॉर्ड के हिसाब से कम करने के लिए एक नायाब सुझाव पेश किया है।

दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ अधिकारी की तरफ से एक परिपत्र भेजा गया है कि ऐसे मामलों में अंतिम रिपोर्ट लगाने की कालावधि को तीन वर्ष से एक वर्ष किया जाए। स्पष्ट है कि पहले अगर किसी बच्चे के गायब या अपहृत होने के बाद कम से कम तीन वर्ष तक उसका मामला पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज रहता था और अब एक ही झटके से उसे एक वर्ष कर देने से निश्चित ही पुलिस रिकॉर्ड बेहतर दिख सकेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें