अपने पहले बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने रक्षा क्षेत्र के मद्देनजर जो कुछ खास घोषणाएं कीं, वे बेशक महत्वपूर्ण हैं, मगर सत्ता संभालने के सौ दिनों के भीतर ठोस नतीजे दिखाने के सरकार के वायदों पर खरी उतरती नहीं दिखतीं। हालांकि कुछ विवेकपूर्ण गैर-राजकोषीय उपायों को अपनाकर सरकार अपने वायदों को लेकर प्रतिबद्धता जरूर दिखा सकती थी। और इसके लिए बजट भाषण से बेहतर कोई अवसर नहीं हो सकता था।
पूंजी व्यय के तहत पांच हजार करोड़ रुपये का जो अतिरिक्त आवंटन किया गया है, उससे संदेश जाता है कि यह राशि सैन्य बलों के आधुनिकीकरण पर खर्च होगी। मगर सच यह है कि इसकी ज्यादातर राशि डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) को मिलेगी। इसमें से 677 करोड़ आयुध फैक्टरियों को और एक हजार करोड़ रुपये डिफेंस रेल नेटवर्क के लिए निर्धारित किए गए हैं। सच तो यह है कि इस अतिरिक्त आवंटन के नतीजों के जल्दी दिखने की संभावना कम ही है। दरअसल सैन्य बलों का आधुनिकीकरण केवल बजटीय आवंटन पर ही निर्भर नहीं करता।
वित्त मंत्री महोदय ने दोषपूर्ण सैन्य खरीद प्रक्रिया को सरल एवं कारगर बनाने के लिए जल्द ही ठोस कदम उठाने की घोषणा की है, मगर इसमें कुछ भी नया नहीं है। ऐसी घोषणाएं पहले भी तमाम मौकों पर हुई हैं। इतना ही नहीं, पिछले बारह वर्षों में खरीद प्रक्रिया को चार बार संशोधित भी किया गया है। जरूरत तो इसकी है कि रक्षा उत्पादन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और आयात-निर्यात समायोजन से जुड़ी नीतियों और प्रक्रियाओं में तालमेल बैठाते हुए एक समग्र दस्तावेज तैयार किया जाए। बजट में अगर 100 दिनों के भीतर ऐसी समग्र नीति का प्रारूप तैयार करने की बात की जाती, तो यह राहत की बात होती।
कुछ ऐसी ही कहानी 'वन रैंक- वन पेंशन' योजना के क्रियान्वयन के लिए एक हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त आवंटन की है। इसके बजाय अगर बजट में सैन्य पेंशन से जुड़े मुद्दों को अगले तीन महीनों में सुलझा देने का वायदा किया जाता, तो सैन्य बलों के लाखों पेंशनभोगियों और उनके परिवारों को एक हजार करोड़ रुपये के आवंटन से कहीं ज्यादा खुशी होती। युद्ध स्मारक (वार मेमोरियल) को लेकर घोषणा एक स्वागतयोग्य कदम है, पर इसके लिए 100 करोड़ रुपये का आवंटन कुछ ज्यादा ही है।
वर्तमान वित्तीय वर्ष के अंत तक इस राशि को खर्च कर पाना भी एक चुनौती होगा। इसके बजाय इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाता, तो ज्यादा बेहतर होता। इसके अलावा तकनीकी विकास फंड के नाम पर 100 करोड़ रुपये आवंटित करते हुए, यह ध्यान नहीं रखा गया कि पहले भी ऐसी घोषणाएं निरर्थक साबित होती रही हैं। बजट में यह भी साफ नहीं है कि निश्चित कार्य योजना के अभाव में फंड का उपयोग किस तरह हो सकेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह घोषणा पूर्व की घोषणाओं से किस तरह अलग है। अब यह तो समय ही बताएगा कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 49 प्रतिशत किए जाने से निवेश के रूप में कितना फायदा हो सकेगा।
सच तो यह है कि बजट में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो संभावित निवेशकों को आकर्षित कर सके, और अगर ऐसा हो भी गया, तो नतीजे आने में काफी लंबा समय लगना तय है। इस कड़वे सच को स्वीकारना होगा कि देश के भीतर एफडीआई के प्रवाह की दृष्टि से भारत के लिए नया बजट कोई संभावनाएं नहीं जगाता। देश के औद्योगिक माहौल में सुधार के लिए एक समयबद्ध योजना की घोषणा इस बजट में होनी चाहिए थी, जो नहीं हुई।
सैन्य बलों के पास उच्चस्तरीय युद्ध सामग्री का खासा अभाव है। अगर बजट में इस कमी को दूर करने की घोषणा होती, तो बेहतर होता। रक्षा मंत्रालय का भी कार्यभार संभाल रहे वित्त मंत्री के पास अच्छा मौका था कि वे बड़ी खरीदों को इस वर्ष पूरा करने का आश्वासन देते, और चली आ रही अफवाहों का सार्वजनिक तौर पर खंडन करते। इससे जवाबदेही का माहौल भी कायम होता। इसके अलावा प्रमुख बुनियादी परियोजनाओं को लेकर भी ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, जिसमें न सिर्फ इस पर एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा नजर रखने की व्यवस्था हो, साथ ही, हर वर्ष इनके प्रदर्शन पर एक रिपोर्ट भी संसद में रखे जाने की भी बात हो।
सेवारत सैन्य कर्मियों और पेंशनभोगियों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि पांच वर्ष पहले सैन्य बलों के लिए अलग वेतन आयोग का जो वायदा किया गया था, वह अब तक पूरा नहीं हो सका है। अब तक ऐसा न हो पाने की वजहों को सार्वजनिक करके सैन्य बलों को दिलासा दी जा सकती थी। साथ ही, यह घोषणा भी की जा सकती थी कि तीस लाख से भी ज्यादा सेवारत और पेंशनभोगी सैन्य कार्मिकों के हितों की रक्षा करने के लिए सातवें वेतन आयोग में एक अतिरिक्त सेवा-सदस्य की नियुक्ति की जाएगी।
इसके अलावा उच्च स्तर पर रक्षा प्रबंधन, नागरिक-सेना संबंधों, स्वदेशीकरण, एयरोस्पेस नियंत्रण के प्रसार और भ्रष्टाचार समेत ऐसे तमाम मुद्दे थे, जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। अगर अब भी रक्षा क्षेत्र को सुदृढ़ तथा मजबूत बनाने और देश की सुरक्षा के लिए एक पांचवर्षीय समग्र कार्यक्रम की घोषणा सरकार कर दे, तो यह सैन्य सुदृढ़ीकरण के लिहाज से मील का पत्थर साबित होगी। सकारात्मक कदमों को उठाने का कोई समय नहीं होता। बतौर वित्त मंत्री अरुण जेटली बेशक ऐसा कुछ कर पाने में असमर्थ रहे हों, मगर रक्षा मंत्री के तौर पर देश की सुरक्षा और सैन्य क्षेत्र के लिए 'अच्छे दिन' लाने का मौका उनके पास बचा हुआ है।
(लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व वित्त सलाहकार एवं पूर्व अतिरिक्त सचिव हैं)