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अब मैं सपने बेचता हूं

Wed, 16 Jul 2014 07:16 PM IST
सुधाकर आशावादी
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बुरा मत मानना, अब मेरा स्टेटस बढ़ चुका है। मैं चाय बेचने वाला नहीं रहा। अब मैं सपने बेचता हूं। सपने भी ऐसे-वैसे नहीं, सिर्फ अच्छे दिनों के सपने। यकीन न आए, तो मार्केटिंग का मेरा इतिहास उठाकर देख लीजिए। बाजार में अपनी दुकानदारी के लिए हर आदमी को विज्ञापन का सहारा लेना ही पड़ता है। सब जानते हैं कि हर चमकने वाली पीली वस्तु सोना नहीं होती। विज्ञापन के आधार पर माल खरीदने से पहले उसकी जांच-परख भी जरूरी होती है।
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आप देश की बात करते हैं। देश केवल मेरा नहीं है, आप सभी का है। सो सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि कोई भी समस्या आए, सब मिल-बैठकर उसका समाधान करें। हमारे यहां बैठकों की परंपरा बरसों पुरानी है। समस्या चाहे कोई भी हो। चाहे आलू-प्याज की महंगाई का मुद्दा हो या अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ने का। हर समस्या का समाधान बैठकों से ही होता है।

यदि हम बैठेंगे नहीं, तो शांतिपूर्वक समस्या का विश्लेषण कैसे करेंगे। हमें पता होना चाहिए कि समस्या नई पैदा हुई है या हमें विरासत में मिली है। यदि समस्या का सही समाधान हो गया, तो समस्या नई कही जाएगी। यदि समाधान नहीं हुआ, तो कहना होगा कि समस्या हमें विरासत में मिली है।
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मैं केवल मजबूत देश की बात करता हूं। तभी मैंने राजतिलक में अपने अड़ोसी-पड़ोसियों को बुलाया। उन्हें समझा दिया कि मेरे वजूद को कम न आंके। अभी मुझे समय ही कहां मिला है कि कुछ सोच-समझ सकूं। फिर भी आप कहते हो, तो देश के बारे में भी सोचा जाएगा, पहले अपनी विदेशी जड़ें तो मजबूत कर लें। ऐसी स्थिति बन जाए कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा हमें बंदर घुड़की न दे सके। शेर इलाके में एक ही रहेगा।

वैसे कोई जादू की छड़ी तो हमारे पास है नहीं। फिर भी आप अच्छे दिनों के सपने देख सकते हैं। आप सिर्फ महंगाई का रोना रोते रहते हैं। लेकिन यह तो आपके भाग्य में लिखा है। राजतिलक चाहे किसी का भी हो, सब्जी में महंगाई का छौंक लगना तो अनिवार्य है।
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